नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्यवहारसमुद्देशः १५३
सा तीर्थयात्रा यस्यामकृत्यनिवृत्तिः ॥ ५१ ॥
तीर्थ यात्रा वही सफल है जिसमें मनुष्य दुष्कृत्य का परित्याग कर दे ।
तत् पाण्डित्यं यत्र वयोविद्योचितमनुष्ठानम् ॥ ५२ ॥
पाण्डित्य वही सफल है जिसमें अवस्था और विद्या के अनुरूप आचरण
किया जाय ।
तच्चातुर्यं यत् परप्रीत्या कार्यसाधनम् ॥ ५३ ॥
चतुराई वही है जिसमें दूसरे को प्रसन्न रख कर अपना कार्य सिद्ध
किया जाय ।
तल्लोकोचितत्वं यत् सर्वजनादेयत्वम् ॥ ५४ ॥
लोकोचित वही कर्म है जिससे मनुष्य सबका प्रिय पात्र बन जाय ।
तत् सौजन्यं यत्र नास्ति परोद्वेगः ॥ ५५ ॥
सज्जनता वही है जिसमें दूसरे को किसी प्रकार का उद्वेग ( भय और
त्रास ) न प्रतीत हो ।
तद्धीरत्वं यत्र यौवने नापवादः ॥ ५६ ॥
धीरता वही है जिसमें युवावस्था में कोई अपयश न हो ।
तत्सौभाग्यं यत्रादानेन वशीकरणम् ॥ ५७ ॥
मनुष्य का सौभाग्य वही है कि वह किसी को कुछ दे भी नहीं और लोग
उसके वश में रहें ।
सा सभारण्यानी यस्यां न सन्ति विद्वांसः ॥ ५८ ॥
वह सभा अरण्यस्थली है जिसमें विद्वान् न हों ।
किं तेनात्मनः प्रियेण यस्य न भवति स्वयं प्रियः ॥ ५६ ॥
कोई व्यक्ति अपना प्रिय तो हो, किन्तु उसके लिये आप प्रिय न हों तो
उस प्रियता से क्या लाभ ? अर्थात् प्रीति दोनों ओर से समान होनी चाहिए ।
स किं प्रभुर्यो न सहते ॰परिजनसम्बाधम् ॥ ६० ॥
वह स्वामी श्लाघनीय नहीं है जो सेवकों की बाधाओं और आवश्यकताओं
को नहीं सहन कर सकता, अर्थात् सेवकों की आवश्यकता के अनुकूल यदि
व्यय न कर सके तो वह स्वामी ठीक नहीं है ।
न लेखाद्वचनं प्रमाणम् ॥ ६१ ॥
लेख से बढ़कर वचन को प्रमाण नहीं माना जाता ।
अनभिज्ञाते लेखेऽपि नास्ति सम्प्रत्ययः ॥ ६२ ॥
बिना हस्ताक्षर आदि का अपरिचित लेख भी विश्वसनीय नहीं होता ।
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu