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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( ३४२ ) ६ अ० ६ पा० ३ खं०
सो वो 'अर्यमा-देवः' अर्यमा देव तुझे 'ददातु' देवे । अथवा
अर्यमा देव अपने प्यारे धन को हे यजमान ! तुझे दे । 'पूषा
वामं ददातु' पूषा देव तुझे वाञ्छनीय धन दे । ' भगः वामं
ददातु' भग देव तुझे वाञ्छनीय धन दे । 'करूलती देवः वामं
ददातु ' करूलती कटे दांत वाली देवता तुझे वाञ्छनीय
धन दे ।
यहां ' करूलती ' यह पद कटे हुए दांत रूप गुण को
बोधन करता है, अतः विशेषण शब्द है, किसी देवता का
नाम नहीं, और इसी मन्त्र में इससे पूर्व 'भग' 'पूषा' ये भिन्न
भिन्न देवताओं के नाम आये हैं, इस से यह सन्देह का स्थान
होने से विचार किया जाता है कि “ ततः करूलती ”
सो कौन 'करूलती' है, भग या पूषा ? एकमत है-“ भग” ।
क्योंकि-‘करूलती पद से पूर्व समीप में 'भग' ही पढाहुआ है
इससे प्रतीत होता है कि-‘करूलती' 'भग' को ही कहा गया
है 'करूलती' पदसे उसी को अन्वादेश-फिर स्मरण किया
गया है ।
दूसरा मत है कि-‘करूलती' पूषा देवता को कहा गया
है । क्योंकि-वह अदन्त-बिना दांत का है । यह कहां से
जाना गया कि-पूषा अदन्त है ?
“ अदन्तकः पूषा ” पूषा अदन्त है, यह ब्राह्मण
ग्रन्थ है ।
प्राशित्र भाग के ब्राह्मण में इसका पूरा इतिहास ऐसा
सुनाजाता है-
“ तत् पूष्णे पर्य्याजह्रुः, तत् पूषा प्राश्नात्, तस्य

हिन्दी निरुक्त ( ३४३ ) ६ अ० ६ पा० ३ खं०
दतो निर्जघान, तस्मादाहुः- अदन्तकः पूषा”
वह हविः पूषाको दिया गया, पूषाने उसे खालिया, उस
के दांत तोड़ दिये गए, इस कारण पूषा अदन्त है, ऐसा कहते
हैं। इससे जिन्होंने समीपता मात्रके कारण भग को 'करूलती'
कहा, सो ठीक नहीं है। क्योंकि-कहा भी है-
“यस्य येनार्थसम्बन्धो दूरस्थमपि तस्य तत् ।
अर्थतो ह्यसमर्थानामानन्तर्यमकारणम् ॥”
अर्थात्- जिस पदका जिस पदके साथ अर्थ-सम्बन्ध है-
अर्थ जुड़ता है, वह दूर पढ़ाहुआ भी पद उसीका है। क्योंकि-
अर्थ से असमर्थ सम्बन्ध न रखने वाले पदों का आनन्तर्य-
निकट होना कारण नहीं-सम्बन्ध का हेतु नहीं ॥
'दनः' (१२४) यह अनवगत 'दानमनस' ( दान में मन रखने वाले )
के अर्थ में है।
“दनो विश इन्द्र मृध्रवाचः”
'इन्द्र' हे इन्द्र ! देव ! हमारे लिये 'विशः' ( मनुष्यान् )
मनुष्यों को 'दनः' ( दानमनसः ) देनेके मन वाले और 'मृध्र-
वाचः' ( मृदुवाचः ) मीठी वाणी वाले ( कुरु ) कर ।
'शरारुः' (१२५) यह अनवगत 'सशिशरिषु.१'-'मुमूर्षु.२' ( मरने की
इच्छा वाला ) के अर्थ में है-
“अवीरामिव मामयं शरारुरभिमन्यते ।
उताहमस्मि वीरिणीन्द्रपत्नी मरुत्सखा विश्वस्मा-
दिन्द्र उत्तरः ॥”
इस ऋचा का इन्द्र देवता, इन्द्रपत्नी ऋषि, और पङ्क्ति
छन्द है । इन्द्रपत्नी कहती है-'अयं शरारुः'-( बालः-मूर्खः-

हिन्दी निरुक्त ( ३४४ ) ६ अ० ६ पा० ३ खं०


संशिशरिषुः-सुमूषुः ) यह बालक-अज्ञान-मरने की इच्छा
वाला-मूढ 'माम् अवीराम्-इव मन्यते' मुझे अवीरा-बिना
वीर की अबला जैसी मानता है। यह इसकी अत्यन्त ही क्षुद्र
मति है। किन्तु 'उत' वास्तव में 'अहम् वीरिखी अस्मि' मैं
वीरिखी-वीर वाली इन्द्रपत्नी हूं। 'इन्द्रः मरुत्सखा विश्व-
स्मात् उत्तरः' इन्द्र मरुतों का मित्र और संसार में सबसे बड़ा
बलवान् या प्रभुके गुणोंसे ऊंचा है। इस प्रकार यहां 'शरारु'
शब्द 'संशिशरिषुः' ( शरीर को छोड़ने की इच्छा वाला ) के
अर्थ में है।
इस मन्त्र में जिस अत्याचारी पर इन्द्राणी क्रोधाग्नि
उगल रही है, वह नहुष राजा या और कोई हो सकता है।
क्योंकि-नहुष ने भी किसी समय इन्द्राणी पर आक्रमण करना
चाहा था, यह आख्यान पुराणों में भी मिलता है। यह मन्त्र
इन्द्राणी के द्वारा पतिव्रता के दृढ भावों को सूचित करता है,
इस लिये स्त्रियों को यह बड़ा आदरणीय तथा हृदय में रखने
योग्य है। जिस प्रकार हिन्दुस्थान में हिन्दुओं के इतिहासों
में पुराणों में और प्राचीनतम कालसे अद्य पर्यन्त हिन्दू स्त्रियों
में सतीपना देखागया और देखा जाता है, वैसा ही वेद मन्त्रों
में भी अधिकता से मिलता है। इस से ऐसा समझने का
किसी को अवसर न होगा कि-स्त्रियों का पातिव्रत्य धर्म
किसी समय विशेष में गढ लिया गया होगा। सुतराम् हिन्दू
स्त्रियों का यह पातिव्रत्य धर्म वैदिक और अनादि है।
'इदंयुः' (१२६) यह अनवगत पद अनेक़ार्थ है—इसके अनेक अर्थ हैं।
'इदंयुः' क्या ? 'इदं कामयमानः' (इस की कामना
करने वाला) होता है। यहां 'इदम्' यह पद वाञ्छित वस्तु

हिन्दी निरुक्त ( ३४५ ) ६ अ० ६ पा० ४ खं०
मात्र के लिये है, अर्थात्-कामना या प्रार्थना करने वाले को
‘इदंयु’ कहाजाता है । 'यु' शब्द कामना अर्थ में प्रसिद्ध नहीं
इसका बोल चालमें बहुत प्रयोग नहीं होता है, इस कारण
'इदंयु' शब्द अनवगत है ।
और भी 'तद्वत्' (उस वाले) के अर्थ में बोला जाता
है-हिन्दी में जहाँ 'वाला' शब्द जोड़ा जाता है-जिस अर्थ के
लिये कहा जाता है, संस्कृत में उसी प्रयोजन के अर्थ 'यु' शब्द
दिया जाता है । जैसे “वसूयुरिन्द्रः” यहां ‘इन्द्र वसूयु
अर्थात् वसुमान् = वसुवाला = धनवाला है ऐसा अर्थ होना
है। क्योंकि परिपूर्ण इन्द्रमें वसुकी कामना का संभव नहीं
इस से यहां 'यु' तद्वत् अर्थ में है ।
“अश्वयु र्गव्यू रथयुर्वसूयुः”
‘इन्द्रः’ इन्द्र ‘अश्वयुः’ घोड़े वाला ‘गव्युः’ गोवाला ‘रथयुः
रथवाला और ‘वसूयुः’ धनवाला है । यह भी निगम है । इस
प्रकार इस निगम में 'अश्वयु' (अश्ववाला) आदि शब्दों में
अनेक बार 'तद्वत्' के अर्थ में 'यु' शब्द का प्रयोग आया है ।
यहां ये सब इन्द्र के विशेषण हैं, अतः कामना का संभव न
होने से 'तद्वत्' का अर्थ ही लिया जासकता है । ३ ( ३१ ) ॥
( खं० ४ )
निघ०-कीकटेषु ॥१२७॥ बुन्दः ॥१२८॥
निरु०-“किं ते कृण्वन्ति कीकटेषु गावो नाशिरं
दुह्रेन तपन्ति घर्मम् । आनो भर प्रमगन्दस्य वेदो
नैचाशाखं मघवन््रन्धया नः ॥” ( ऋ० सं० ३,३,
२१, ४ ) ॥
४४

हिन्दी निरुक्त ( ३४६ ) ६ अ० ६ पा० ५खं०

किं ते कुर्वन्ति कीकटेषु गावः ।
'कीकटाः' नाम देशः, अनार्यनिवासः ।
कीकटाः 'किंकृताः । किं क्रियाभिः-इति
प्रेप्सा वा ।
नैव च आशिरं दुह्रे, न तपन्ति घर्मम्, हर्म्यम्
आहर नः प्रमगन्दस्य धनानि ।
'मगन्दः' कुसीदी ।
'मागन्दः' माम् आगमिष्यति इति च ददाति,
तदपत्यं 'प्रमगन्दः' अत्यन्तकुसीदिकुलीनः ।
प्रमदको वा । यः-'अयमेवास्ति लोके, नपरः'
इति प्रेप्सुः ।
षण्डको वा । षण्डकः षण्डगः, प्रार्दको वा ।
प्रार्दयति-अण्डौ । 'आण्डो' आणी इव व्रीड
यति तस् मे ॥
'नैचाशाखम्' नीचाशाखः = नीचैः शाखः ।
'शाखाः' शक्नोतेः ।

१ सोममिश्रणयोग्यं पयः ( सा० भा० )
२ घर्मं घरणम् । इति सायणाभाष्यस्थनिरुक्तपाठः । प्र-
वर्याख्यं कर्मोपयुक्तं महावीरपात्रं स्वपयः प्रदानद्वारेण न
तपन्ति ( सा० भा० )

हिन्दी निरुक्त ( ३४७ ) ६ अ० ६ पा० ४ खं०
'आणिः' अरणात् ।
तन्नो मघवञ्रन्धय इति । रध्यति र्वशगमने ॥
'बुन्दः' इषुुर्भवति । बुन्दो वा । भिन्दो वा ।
भयदो वा । भासमानो द्रवति इति वा ॥४(३२)॥
अर्थः-'कीकटाः' (१५७) यह अनवगत है । 'किंकृताः'
अथवा 'किं-क्रियाभिः' ये इसकी शब्द समाधियें हैं । इस का
वाच्य अर्थ अनार्यों का म्लेच्छों का निवास देश है ।
“किं ते कृण्वन्ति” इस ऋचा का विश्वामित्र ऋषि,
इन्द्र देवता और त्रिष्टुप् छन्द है ।
हे इन्द्रदेव ! (याः) जो 'कीकटेषु' (अनार्यदेशनिवासिषु
मनुष्येषु) म्लेच्छ देश के रहने वाले मनुष्यों में या म्लेच्छों के
देश में 'गावः' गौयें हैं, (ताः) वे 'ते' तेरा 'किम्' क्या 'कृण्व-
न्ति' (कुर्वन्ति) करती हैं ? [ कुछ नहीं ] क्यों? “न आशि-
रं दुहे” न आशिर [सोममें मिलाने योग्य दूध] देती हैं, और
“न तपन्ति घर्मम्” न घर्म [महावीर पात्र] को अपने
दूध से तपाती हैं। [प्रयोजन यह कि-और भी अग्निहोत्रादि
कर्मों में वे उपयुक्त नहीं होतीं ।] इस से हम कहते हैं—
“आभर (हर) नः (ताः गाः)” लेआ उन गौओंको हमारे
पास [क्योंकि-हमउन गौओंसे आशिर आदि हविः तैयार करके
तुम्हारा उपकार करेंगे ।] और “प्रमगन्दस्य वेदः” जो
यह प्रमगन्द-अत्यन्त ही ब्याज खाने वाले पुरुष का धन है,
सो भी 'आभर' लेआ । [क्योंकि-वह भी तेरे यजन में नहीं
लगता ।] और “नैचाशाखं मघवन् ! रन्धय नः'

हिन्दी निरुक्त ( ३५८ ) ६ अ० ६ पा० ४ खं०
हे मघवन् ! इन्द्र ! नीचाशाख-नीचकुलप्रसूत-नीच कुल में जन्मे
हुये दीनतुल्य जनके धनको भी हमारे अधीन करदे । [ क्योंकि
नीचस्वभाव जनों का धन भी तेरे यज्ञमें नहीं लगता । ] इस
प्रकार यहां ‘ कीकट ’ शब्द शब्द की समानता और अर्थ की
योग्यता से अनार्य देशवासी मनुष्यों को कहता है ।
इस मन्त्रसे यह भले प्रकार प्रकट होता है, कि-कहीं भी
किसी पुरुषके पास साधारण के उपयोग में या महाकार्य में न
आने वाला धन रुका हुआ पड़ा हो, उसे राजशासन के द्वारा
लेकर देवकार्य-महाकार्य में उपयुक्त करना चाहिये ।
‘कीकट’ क्या ? देश । कौनसा ? जो अनार्यों या म्लेच्छों
का निवास हो ।
‘कीकटा:’ कैसे ? ‘किंकृताः’ ( ये क्यों किये गए हैं, इनसे
कोई अर्थ नहीं है, ऐसा जिन्हें कहा जावे । ) शब्द से है ।
अर्थात्-ये देवताओं, पितरों तथा मनुष्यों का कोई उपकार
नहीं करते इससे ये ‘किंकृत’ हैं, और ‘किंकृत’ कहे जाते हुये
‘कीकट’ कहे जाने लगे ।
अथवा-जिनकी ऐसी प्रेप्सा-अभिप्राय है, कि- “ किं
क्रियाभिः ” क्या क्रियाओं से (कर्मों से) है, [ किन्तु कोई
फल जन्मान्तर में नहीं है । ] वे मनुष्य ( नास्तिक जन ) ‘किं-
क्रिय’ कहे जाते हुये ‘कीकट’ कहे जाने लगे ।
‘घर्म’ क्या ? हर्म्य उन धनाढ्यों के स्थान, जो वैदिक
अग्नि वाले मनुष्य हैं, जिनके घर अग्निहोत्रादि कर्मोंसे नित्य
ही गरम रहते हैं । अथवा घर्म क्या ? महावीरपात्र । क्यों ?
घरण होनेसे । क्योंकि-उसमें दूध झरता है । ‘घृ’ क्षरणादीप्त्योः
( जु० प० ) धातु से है ।

हिन्दी निरुक्त ( ३४६ ) ६ अ० ६ पा० ४ खं०
'प्रमगन्द' क्या ? 'मगन्द' कुसीदी-व्याज लेने वाला वा-
णियाँ । 'मगन्द' क्या ? ' मागन्द ' । ' मागन्द ' ही क्या ?
“माम्-आगमिष्यति” मेरे पास आवेगा, इस हेतु वह
अपना धन दूसरे को दे देता है । उस (मगन्द) का अपत्य-पुत्र
'प्रमगन्द' होता है । वह कौन 'अत्यन्तकुसीदिकुलीन ' बहुत
ही बहुत व्याज खाने वाले के कुल में जन्मने वाला । प्रयोजन
यह कि-'माम्-आ-गम्-दा' इन चार शब्दों का संक्षेपरूप 'मा-
गन्द' शब्द हुआ । ( १ ) 'माम्' या 'मा' ( मुझको ) 'अस्मद्'
शब्दके द्वितीया के एक वचन का रूप है । (२) 'आ' (आङ्)
उपसर्ग ( आ अर्थमें ) है । (३) 'गम्' (भ्वा०प०) ( जाना अर्थ
में ) धातु है । और (४) 'दा' ( दान अर्थ में ) (जु०उ०) धातु
है । 'मागन्द' का संक्षेप-छोटा रूप ' मगन्द ' हुआ । और
' मगन्द ' तथा 'प्र' इन दोनों के योग से ' प्रमगन्द ' हुआ ।
'मगन्द' का अर्थ कुसीदी ( व्याजडिया ) है, और 'प्र' का अर्थ
अपत्य या पुत्र है । मिलकर 'कुसीदी का पुत्र' अर्थ होता है।
जैसे-'प्रस्कण्व' शब्दमें 'कण्व का पुत्र' अर्थ होता है ।
अथवा 'प्रमदक' शब्द से 'प्रमगन्द' हुआ । प्रमदक' क्या?
जो 'यही लोक है, किन्तु पर लोक नहीं' ऐसे अभिप्राय वाला
मनुष्य वह 'प्रमाद करने वाला ' होने से 'प्रमदक' है । इस
पक्षमें 'प्र' ( उप० ) और 'मद्' ( दि० प० ) धातु के योग से
'प्रमद्' शब्द और उस के विकार से 'प्रमगन्द' शब्द हुआ ।
अथवा 'षण्डक'-हीजड़ा 'प्रमगन्द' होता है। इसमें शब्द
की समानता बहुत थोड़ी, और अर्थ की समानता बहुत है ।
'षण्डक' क्या ! 'षण्डग' , षण्ड हीजड़े को गमन करने
वाला । [ क्योंकि हीजड़ा हीजड़े के पास ही रहता है, अन्यत्र
उसका निर्वाह नहीं होता । ]

हिन्दी निरुक्त ( ३५० ) ६ अ० ६ पा० ५ खंड
अथवा 'प्रादक' होने से 'पण्डक' है। क्योंकि-वह अञ्जानों
के साथ स्त्री के रूपमें मैथुन कर्म में प्रवृत्त हुआ आण्डों (आंडों)
को अर्द्दन-पीडन करता है।
'आण्ड' क्यों ? आंक्षिणों (कीलों या डहियों) के समान
होने से। उनको (होजड़ा (व्रीडन करता है, (पपोलता है)
या स्तम्भन करता है (थामता है) इस रीति से आण्डव्रीडन से
या आण्डस्तम्भन से पण्डक है।
'नैचाशाख' क्या ? नीचाशाख = नीचैःशाख = जिसकी
शाखा झुकी हुई हो, अर्थात्-नीचकुलमें उत्पन्न होने वाला।
'शाखा' कैसे ? शक्ति अर्थमें 'शक्' (स्वा०उ०) धातुसे है।
'आणि' कैसे ? अरण = गमन से । 'ऋ०' (भ्वा० प०)
धातु से।
'रन्धय' यह वशगमन-वशमें होना अर्थ में 'रध' (दि०
प०) धातु है। (णिच्का रूप है।)
'बुन्द' (१२८) इषु-बाण होता है। 'बुन्द' क्यों ?
अथवा 'भिन्द' होता है। अथवा 'भयद्' भयका देनेवाला है।
अथवा भासमान (चमकता हुआ) चलता है ॥४(३२)॥
(खं० ५)
निरु०-“तुविक्षंते सुकृतं सूमयं धनुः साधु-
र्बुन्दो हिरण्ययः। उभा ते बाहू रण्या सुसंस्कृत ऋदू-
पे चिद्ददृवृधा ॥” (ऋ० सं० ६, ५, ३०, ६) ॥
'तुविक्षं' बहुविक्षेपम् । महाविक्षेपम् वा ।
ते, 'सुकृतं' 'सूमयं' सुसुखं धनुः साधयिता ।
ते, बुन्दो हिरण्ययः । उभौ ते बाहू रण्यौ

हिन्दी निरुक्त ( ३५१ ) ६ अ० ६ पा० ५ खं०
रमणीयौ सांग्राम्यौ वा ।
ऋदूपे अर्दनपातिनौ गमनपातिनौ शब्दपाति-
नौ दूरपातिनौ वा ।
मर्माणि वेधिनौ गमनवेधिनौ शब्दवेधिनौ दूर-
वेधिनौ वा ॥ ५ ( ३३ ) ॥
“तुविक्षं ते सुकृतम्” इस ऋचा का और “निराविध्यत्” इस ऋचा का
कुरुस्तुति ऋषि, इन्द्र देवता, पहिली का सतोबृहती छन्द और दूसरी का
गायत्री छन्द है।
अर्थः-हे इन्द्र ! ‘ते’ तेरा ‘धनुः’ धनुष् ‘तुविक्षम्’ (बहुवि-
क्षेपम् महाविक्षेपं वा ) अनेक प्रकार वाणोंको फेंकनेवाला या
दूर फेंकनेवाला है, ‘सुकृतम्’ उससे शोभन कर्म किये जाते हैं,
अथवा अच्छा कियागया-बनाया हुआ है। ‘सूमयम्’ सुखमय-
सुखरूप है, (ते) तेरा ‘बुन्दः’ बाण ‘साधुः’ स्तुतिओंका साधने
वाला अथवा शत्रुओंका साधनेवाला और ‘हिरण्ययः’ सोनेका
है। ‘ते’ तेरे ‘उभा’ (उभौ, दोनों ‘बाहू’ भुज ‘रण्यौ’ रमणीय-सुन्दर
अथवा रण के योग्य हैं, ‘सुसंस्कृता’ (सुसंस्कृतौ) सुन्दर
शिक्षा प्राप्त हैं । ‘ऋदूपे’ अर्दनपाती-दुःखदायिओं पर गिरने
वाले अथवा गमनपाती-शत्रुओं पर जाकर गिरनेवाले, किन्तु
कायरों के समान खटिया पर गिरने वाले नहीं, अथवा शब्द-
पाती-शत्रु की ललकार के साथ गिरने वाले, अथवा दूरपाती
दूर तक जाने वाले हैं, ‘ऋदूवृधा’ (ऋदूवृधौ) ‘ऋदू’ यह मर्म
स्थान का नाम है, उसमें वेधने वाले, अथवा अर्दनवेधी-पीडा
करने वालों पर बिँधने वाले, अथवा गमनवेधी-जाकर बेधने
वाले अथवा शब्दवेधी अथवा दूरवेधी हैं। इस प्रकार यहां
धनुष् के सम्बन्ध से ‘बुन्द’ नाम बाणका है ॥ भगवद्दुर्गाचार्य

हिन्दी निरुक्त ( ३५२ ) ६ अ० ६ पा० ५ खं०
कहते हैं कि-इस मन्त्रमें “ऋदूपे” और “ऋदूवृधा” इन
दो पदों का भाष्य ठीक जैसा प्रतीत नहीं होता, उसका ठीक
पाठ ढूंढकर फिर व्याख्या करना चाहिए। किन्तु उन्होंने जो
भाष्य की व्याख्या की उससे वे पद ठीक लग जाते हैं ।
दोनों शब्दों में धातुओं के साथ लगे हुए 'ऋदू' शब्द के अर्थों
का ही भाष्यकार विकल्प करते हैं । वे-अर्दन (१) गमन (२)
शब्द (३) दूर (४) ये चार हैं । पहिले शब्द ( ऋदूप ) में 'प'
शब्द से पतनार्थक 'पत' ( भ्वा० प० ) धातु और दूसरे शब्द
(ऋदूवृधा) में 'वृध्' से वेधार्थक 'वृध' (भ्वा० आ०) धातु लिया
गया है। यदि “ऋदूपे” पदमें 'ऋदूपा' 'ई' ऐसे दो पद रखे
जावें तो और भी उस की द्विवचनान्तता तथा “बाहू” की
विशेषता सुप्रकट हो जाती है। इसी मन्त्र में इसी बाहू के
विशेषण और भी “रण्वा” “सुसंस्कृता” “ऋदूवृधा”
इसी ढंग के हैं ॥ ५ ( ३३ ) ॥
( खं० ६ )
निघ०-वृन्दम् ॥१२९॥
निरु०-“निराविध्यद्गिरिभ्य आधारयत्पक्वमोदनम् ।
इन्द्रो बुन्दं स्वाततम् ॥” (ऋ० सं० ६, ५, ३०, १)
निरविध्यद् गिरिभ्यः, आधारयत् पक्वम्-ओद-
नम्-उदकदानं मेघम् । इन्द्रो बुन्दं स्वाततम् ।
‘वृन्दं’ बुन्देन व्याख्यातम् ॥ वृन्दारकश्च ॥
६ ( ३४ ) ॥

हिन्दी निरुक्त ( ३५३ ) ६ अ० ६ पा० ७ खं०
अर्थः- 'इन्द्रः' इन्द्रदेव ने 'स्वाततम्' कान तक खिंचे हुये
'बुन्दम्' बाणको (से) 'पक्वम्' बहुत मेघों में पके हुये-जल से
परिपूर्ण 'ओदनम्' जलके दान में समर्थ मेघ को 'निराविध्यत्
वेधा, और 'गिरिभ्यः' मेघों से 'आधारयत्' उनके खाली होने
तक जल गिराया। यहां कानतक खींचने के सम्बन्ध से 'बुन्द'
बाण का नाम है। यह उदाहरण पूर्व उदाहरण से अधिक
स्पष्ट है।
'ओदन' क्या ? उदकदान-जलका देने वाला ॥
'वृन्द' (१२६) यह अनवगत 'बुन्द' के समान ही सम-
झना चाहिए-इसकी व्याख्या उसीसे की गई ॥
'वृन्दारक' शब्द भी 'बुन्द' के व्याख्यान से ही समझना
चाहिए ॥ ६ (३४) ॥
( खं० ७ )
निघ०—किः ॥१३०॥ उल्बम् ॥१३१॥
ऋबीसम्-ऋबीसम् ॥१३२॥
इति द्वात्रिंशच्छतं (१३२) पदानि ॥३॥
निघ०खं०सू०-“जहा सस्निम्-आशुशुक्षणिः त्रीणि”
इति निघण्टौ चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥
निरु०-“अयं यो होता किरु सयमस्य कमप्यूहे
यत्समञ्जन्ति देवाः। अहरहर्जायते मासि मास्य-
था देवादिधिरे हव्यवाहम् ॥” [ऋ०सं० ८,१,१२,३]
अयं यो होता कर्त्ता सः यमस्य, कम्-अपि अ-
न्नम्-अभिवहति, यत् समश्नुवन्ति देवाः । अहर-
४५

हिन्दी निरुक्त ( ३५४ ) ६ अ० ६ पा० ७ खं०
हर्जायते, मासे मासे अर्द्धमासे अर्द्धमासे वा। अथ
देवा निदधिरे हव्यवाहम्।
'उल्बम्' ऊर्णोतेः। वृणोते र्वा।
“महत्तदुल्बं स्थविरं तदासीत्” (ऋ० सं० ६, १,
१०, १) इत्यपि निगमो भवति।
'ऋबीसम्' अपगतभासम्। अपहृतभासम्। अ-
न्तर्हितभासम्। गतभासं वा ॥ ७ (३५) ॥
'किः' (१३०) यह अनवगत 'कर्त्ता' पद के अर्थ में है।
“अयं होता” इस ऋचा के विश्वेदेव ऋषि और अग्नि देवता है। सौचीक
अग्नि और विश्वदेवों के संवाद सूक्त की यह ऋचा है। वहा यह विश्वेदेव
ऋषियो का वाक्य है।
अर्थः- यः अयम् (अग्निः) जो यह अग्नि 'होता' (आ-
हाता देवानाम्) देवताओं को बुलाने वाला (पृथिवीस्थानः)
पृथ्वी में रहने वाला है, 'सः' वह 'यमस्य' (भगवतः आदि-
त्यस्य) भगवान् सूर्य देव का 'किः' (कर्त्ता) करने वाला है।
[क्योंकि-अग्नि से ही प्रातःकाल सूर्य उत्पन्न होता है। सो
कहा है- "एषः प्रातः प्रसुवति तस्मात् प्रातर्नोपति-
ष्ठन्ते” अर्थात् यह प्रातःकाल जन्मता है, इस कारण इसे
प्रातःकाल उपस्थान नहीं करते। आदित्य का 'यम' नाम है,
यह “यस्मिन् वृक्षे सुपलाशे” (ऋ० सं० ८, ७, २३, १)
इस ऋचा पे कहा जावेगा।] 'कम्-अपि-ऊहे' (अन्नम्-अपि-
अमिवहति) उस अन्नको भी लेजाता है, 'यत्-देवाः-समज्ज-
न्ति' (समश्नुवन्ति) जिसे देवता खाते हैं। 'अहः-अहः जायते'

हिन्दी निरुक्त ( ३५५ ) ६ प्र० ६ पा० ७ खं०
यही अग्नि देव अग्निहोत्रियों के घरों में जगाया जाता हुआ
नित्य नित्य महान्-बड़ा होता है। 'मासि-मासि' (मासे-
मासे) महीने महीने पितृयज्ञों में होता है। अथवा (अर्द्ध-
मासे-अर्द्धमासे) आधे मास आधे मास में दर्श-पूर्णमास कर्मों
में होता है। जिससे कि-यह अग्नि देव ऐसे गुणों वाला है,
'अथ' इस कारण इस 'हव्यवाहम्' हव्यों-हविर्यों के पहुंचाने
वाले अग्नि को 'देवाः' देवताओं ने 'दधिरे' (निदधिरे)
स्थापन किया था। इस प्रकार यहां 'यमस्य' इस षष्ठी के
योगसे और शब्द की समानता से 'किः' यह 'कर्त्ता' के
अर्थ में है ॥
'उल्ब' (१३१) यह अनवगत जरायु-जेर का नाम
है। आच्छादन (ढांपना) अर्थ में 'ऊर्णु' (अदा०उ०) धातु से
है। अथवा उसी अर्थ में 'वृ' (स्वा०उ०) धातुसे है। क्योंकि-
उससे गर्भ चारों ओर ढाप लिया जाता है।
"महत्तदुल्बं स्थविरं तदासीद्येनाविष्टः
प्रविवेशिथापः । विश्वा अपश्यद्बहुधा ते अग्ने
जातवेदस्तन्वो देव एकः ॥"
इस ऋचा के विश्वेदेव ऋषि और अग्नि देवता है।
'अग्ने !' हे भगवन् ! अग्निदेव 'तत्' वह 'महत्'
परिमाण से बड़ा और 'स्थविरम्' (चिरंतनम्) पुराना 'उल्बम्'
(जरायु) जेर 'आसीत्' था, 'येन' जिससे 'आविष्टितः'
(आवेष्टितः) लिपटे हुए (त्वम्) तैने पहिले आदि सृष्टि में
'अपः' प्रविवेशिथ' जलमें प्रवेश किया था। और 'जात-वेदः'
हे जातवेदस् ! -जाये जाये को जानने वाले ! 'ते'तेरे 'बहुधा'
अनेक प्रकार के 'विश्वाः' सब 'तन्वः' शरीरों को 'एकः'
एक 'देवः' प्रजापतिदेव ने 'अपश्यत्' देखा है, अर्थात् और

हिन्दी निरुक्त ( ३५६ ) ६ अ० ६ पा० ८खं०
कौन तेरे शरीरों के अन्त को जान सकता है। यह भी निगम
है। इस प्रकार यहांपर आवेष्टन या लपेटनेके सम्बन्धसे 'उल्ब'
शब्द से जरायु या जेर लिया जाना उपपन्न होता है।
'ऋबीस' (१३२) यह अनवगत पृथिवी का नाम है।
इसकी शब्द समाधिएँ, अपगतभास्,-जिससे चमक हटीहुई
है, 'अपहृतभास्'-जिससे चमक हर ली गई है, 'अन्तर्हितभास्'
चमक जिसके भीतर घुस गई है, और 'गतभास्' जिसकी
चमक गत होगई है, ये हैं ॥ ७ (३५) ॥
(खं० ८)
निरु०-“हिमेनाग्निं घ्रंसमवारयेथां पितुमती मूं
मस्माअधत्तम् । ऋबीसे अत्रिमश्विनावनीत मुन्नि-
न्यथुः सर्वगणं स्वस्ति ॥” (ऋ०सं० १,८,९,३)
हिमेन = उदकेन ग्रीष्मान्ते अग्नि घ्रंसम् = अहः
अवारयेथाम्, अन्नवतीं च अस्मै ऊर्जम्-अधत्तम्,
यः अयम् ऋबीसे = पृथिव्याम् अग्निः अन्तःओ-
षधिवनस्पतिषु अप्सु तम्-उन्निन्यथुः सर्वगणं =
सर्वनामानम् ॥
'गणः' गणनात् । गुणश्च ।
यद्दृष्टे ओषधयः उद्यन्ति, प्राणिनश्च पृथिव्यां,
तत्-अश्विनोः रूपम्, तेन एतौ स्तौति स्तौति
॥ ८ (३६) ॥
इति षष्ठाध्यायस्य षष्ठः पादः ॥ ६, ६, ॥

हिन्दी निरुक्त ( ३५७ ) ६ अ० ६ पा० ८ खं०
“हिमेनाग्निम्” इस ऋचाका कक्षीवान् ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और अश्विनी
कुमार देवता हैं । प्रातरनुवाक और आश्विन में शस्त्र है ।
अर्थः-‘अश्विनौ !' हे अश्विनौ ! (युवाम्) तुम दोनों ने
( ग्रीष्मान्ते ) ग्रीष्म ऋतुके अन्त में 'अग्निम्' अग्निके समान
गरम 'घंसम्' (अह्नः) दिनको 'हिमेन' ( उदकेन ) जलसे 'अवा-
रयेथाम्' निवारण किया है । और निवारण कर के ' अस्मै '
( हविर्भाजे अग्नये ) इस हविके भजने वाले-भोगने वाले-खाने
वाले अग्निदेव के लिये ' पितुमतीम् ' ( अन्नवतीम् ) 'ऊर्जम्'
( आज्यलक्षखाम् ) 'अधत्तम्' पुरोडाश आदि रूप अन्नके सहित
घृत रूप ऊर्ज- बलको धारण कियो है । 'ऋबीसे' (पृथिव्याम्)
जो यह पृथिवी में या ओषधि-वनस्पतियों में भीतर प्रविष्ट
हुआ अग्नि है, जिससे पृथ्वी के गर्भमें रखे हुए कन्द मूलादि
पकते हैं, उस 'अत्रिम्' अग्नि को ( अप्सु ) 'अनीतम्' जल में
पहुंचाया है, जो कि बिजली के रूपम बादलों में चमकता है,
और जिसको न्यायशास्त्र में अबिन्धन = जलको जलाने वाला
कहते हैं । हे अश्विनौ ! तुम दोनों ने 'स्वस्ति' सब जगत् के
कल्याण के लिये 'सर्वगणम्' ( सर्वनामानम् ) सब नामों वाले
अग्निको 'उन्निन्थुः' उन्नयन किया है-आविष्कार किया है,
या और तत्वोंमें से छान कर निकाला है ।
संक्षिप्त अर्थ यह हुआ कि-अश्विन् देवता ही ग्रीष्म ऋतु
के अन्तमें वर्षा लाकर दिनों को ठंडा करते हैं। वर्षा के द्वारा
सब ओषधियों को उत्पन्न करते हैं, और उनसे उत्पन्न पुरो-
डाश तथा घृत अग्निको देते हैं। वेही अश्विन देवता पृथिवी
के गर्भ से अग्नि को ऊपर आकाश में ले आते हैं, जो बिजली
के रूप में प्रत्यक्ष होता है, और उन्हीं अश्विन देवों ने सब

जगत् के कल्याण के अर्थ अग्निका आविष्कार किया है । इस
प्रकार इस मन्त्रमें 'ऋबीस' पृथिवी का नाम होता है ॥
इस मन्त्र में 'अनीतम्' पद की व्याख्या विशिष्ट रूप से
भाष्यमें और उसकी टीका में नहीं दिखाई देती, तो भी मन्त्र
के स्वभाव की सहायता से उसका अर्थ लिख दिया गया है ।
इस मन्त्रमें ऋषि ऋचा के चारों पादों को अलग २ क्रियाओं
से अलंकृत करता है, विशेष कर पूर्व दो पादोंको क्रिया पदंसे
ही पूर्ण करता आ रहा है, उसी अभ्यास से तृतीय पाद् को
कर सकता है, जैसे—
(१) “हिमेनाग्निं घंसमवारयेथाम्” (अवारयेथाम्)
(लङ्०म०द्वि०)
(२) “पितुमती मूर्जमस्मा अधत्तम्” (अधत्तम्)
(लङ्०म०द्वि०)
(३) “ऋबीसे अत्रिमश्विनावनीतम्” (अनीतम्)
(लङ्०म०द्वि०)
(४) “उन्निन्यथुः सर्वगणं स्वस्ति” (उन्निन्यथुः)
(लिट्०म०द्वि०)
इस कल्पना में और पादों के समान तृतीय पाद भी
अन्वय में स्वतन्त्र हो जाता है, किन्तु दूसरे पूर्व या पर पाद
की क्रिया की अपेक्षा नहीं करता, और इस पाद की क्रिया
अन्य पादोंके समान मध्यम पुरुष के द्विवचन की हो जाती है,
ऐसी २ समानताएं इस तृतीय पाद को क्रियान्त समझने में
बल देती हैं ।
'गण' कैसे ? गणना से । क्योंकि-वह बहुत द्रव्यों का
संयोगरूप होने से गिना जाता है ।

हिन्दी निरुक्त ( ३५६ ) ६ अ० ६ पा० ३सं०
'गुण' क्यों ? यह भी गणना से ही है। क्योंकि-वह भी
गिना जाता है। जैसे-द्विगुण, त्रिगुण इत्यादि। यह 'गण'
शब्द के सादृश्य से निर्वचन किया गया है।
भाष्यकार दूसरा मन्त्रका संक्षिप्त अर्थ करते हैं—
"यद्वृष्टे"०० इत्यादि। अर्थात्-जिसके बरसने पर पृथिवी
में ओषधिएं और प्राणी उपजते हैं, यह अश्विनों का रूप है,
इसीसे इन दोनोंको ऋषि स्तुति करता है, स्तुति करता है।
पदकी आवृत्ति काण्ड (प्रकरण) की समाप्ति की सूचनाके
लिये है॥ उपर्युक्त काण्ड के अन्तिम निगम के भी अन्त में
'स्वस्ति' पद है, वह भी समाप्ति के मङ्गल के अर्थ है। यह
भाष्यकार के अन्वेषण का महत्व है—“साना और सुगंध” ॥
निरुक्त-षष्ठाध्याय का खण्ड सूत्र—
[प्र०पं०] “त्वमग्ने (इन्द्र आशाभ्यस्परि) (१) अलातृणः
(२) उद्धृह (३) आजासः (४) [द्वि०पा०] उपलप्रक्षिणी (५)
कारुरहम् (६) अस्मेते (७) आयन्त इव यदाते (८) अग्नवंहि
(६) [तृ०पा०] सोमानम् (१०) इन्द्रासोमा (११) कृणुष्व (१२)
तां अध्वरे (१३) अस्ति हि वः (१४) असूत्तै (१५) प्रवोळ्हा
(१६) [च०पा०] सृप्रः (स्तिपा आपः) (१७) तुञ्जे तुञ्जे (१८)
यो अस्मै (१६) अस्मै इदु (२०) तन्तस्तुरीपं (२१) हिनोता
(स्थूलं राधः) (२२) [पं०पा०] अस्मन्नः (२३) मात्वा (२४) न्व
पापासो (२५) यवं वृकेण (२६) जीवान्दो (२७) बतो (२८)

हिन्दी निरुक्त ( ३६० ) ६ अ० ६ पा० ८ खं०

धेनुं नः ( आधवः ) (२६) [वष्पा ] अरायि काणे (३०) वामं
घामं (३१) किं ते (३२) तुविद्यन्ते (३३) निराविध्यत् (३४)
अयं होता (३५) हिमेनाग्निं (३६) षट्त्रिंशत् (३६) ॥ *
इति निरुक्ते पूर्वषट्के षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इति नैरुक्तः पूर्वार्द्धः समाप्तः ॥
इति हिन्दीनिरुक्ते पूर्वषट्के षष्ठोऽध्यायः
पूर्वार्द्धश्च समाप्तः ॥ ६, ६ ॥

❖ श्रीः ❖
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❧ ❖ उत्तरषट्कम् ❖ ❧
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दैवतं काण्डम्
अथ सप्तमोऽध्यायः ॥७॥
( उपोद्घातः )
प्रथमः पादः
( खं० १ )
नैगम काण्ड की व्याख्या के अनन्तर दैवतकाण्ड की
व्याख्या के आरम्भ की प्रतिज्ञा--
(निरु०) अथातो दैवतम् ।
'अथ' नैगम की व्याख्या के अनन्तर 'अतः' यहां से दैवत
प्रकरण की व्याख्या होगी अथवा 'अतः' जिस से कि-अखिल
पुरुषार्थों ( धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ) का हेतु देवता है
इस से “दैवत” प्रकरण की व्याख्या होगी ॥
“दैवत” पद की व्याख्या—
(निरु०-) तद् यानि नामानि प्राधान्यस्तुतीनां
देवतानां तद् “दैवतम्” इति आचक्षते ।
'तत्' सो । क्या ? 'प्राधान्यस्तुतीनाम्' प्राधान्य या
मुख्यता से स्तुति वाले 'देवतानाम्' देवताओं के 'यानि ना-
मानि' जो नाम हैं, 'तद्' “दैवतम्” वह “दैवत” प्रकरण