निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३४७ ) ६ अ० ६ पा० ४ खं०
'आणिः' अरणात् ।
तन्नो मघवञ्रन्धय इति । रध्यति र्वशगमने ॥
'बुन्दः' इषुुर्भवति । बुन्दो वा । भिन्दो वा ।
भयदो वा । भासमानो द्रवति इति वा ॥४(३२)॥
अर्थः-'कीकटाः' (१५७) यह अनवगत है । 'किंकृताः'
अथवा 'किं-क्रियाभिः' ये इसकी शब्द समाधियें हैं । इस का
वाच्य अर्थ अनार्यों का म्लेच्छों का निवास देश है ।
“किं ते कृण्वन्ति” इस ऋचा का विश्वामित्र ऋषि,
इन्द्र देवता और त्रिष्टुप् छन्द है ।
हे इन्द्रदेव ! (याः) जो 'कीकटेषु' (अनार्यदेशनिवासिषु
मनुष्येषु) म्लेच्छ देश के रहने वाले मनुष्यों में या म्लेच्छों के
देश में 'गावः' गौयें हैं, (ताः) वे 'ते' तेरा 'किम्' क्या 'कृण्व-
न्ति' (कुर्वन्ति) करती हैं ? [ कुछ नहीं ] क्यों? “न आशि-
रं दुहे” न आशिर [सोममें मिलाने योग्य दूध] देती हैं, और
“न तपन्ति घर्मम्” न घर्म [महावीर पात्र] को अपने
दूध से तपाती हैं। [प्रयोजन यह कि-और भी अग्निहोत्रादि
कर्मों में वे उपयुक्त नहीं होतीं ।] इस से हम कहते हैं—
“आभर (हर) नः (ताः गाः)” लेआ उन गौओंको हमारे
पास [क्योंकि-हमउन गौओंसे आशिर आदि हविः तैयार करके
तुम्हारा उपकार करेंगे ।] और “प्रमगन्दस्य वेदः” जो
यह प्रमगन्द-अत्यन्त ही ब्याज खाने वाले पुरुष का धन है,
सो भी 'आभर' लेआ । [क्योंकि-वह भी तेरे यजन में नहीं
लगता ।] और “नैचाशाखं मघवन् ! रन्धय नः'