निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३५८ ) ६ अ० ६ पा० ४ खं०
हे मघवन् ! इन्द्र ! नीचाशाख-नीचकुलप्रसूत-नीच कुल में जन्मे
हुये दीनतुल्य जनके धनको भी हमारे अधीन करदे । [ क्योंकि
नीचस्वभाव जनों का धन भी तेरे यज्ञमें नहीं लगता । ] इस
प्रकार यहां ‘ कीकट ’ शब्द शब्द की समानता और अर्थ की
योग्यता से अनार्य देशवासी मनुष्यों को कहता है ।
इस मन्त्रसे यह भले प्रकार प्रकट होता है, कि-कहीं भी
किसी पुरुषके पास साधारण के उपयोग में या महाकार्य में न
आने वाला धन रुका हुआ पड़ा हो, उसे राजशासन के द्वारा
लेकर देवकार्य-महाकार्य में उपयुक्त करना चाहिये ।
‘कीकट’ क्या ? देश । कौनसा ? जो अनार्यों या म्लेच्छों
का निवास हो ।
‘कीकटा:’ कैसे ? ‘किंकृताः’ ( ये क्यों किये गए हैं, इनसे
कोई अर्थ नहीं है, ऐसा जिन्हें कहा जावे । ) शब्द से है ।
अर्थात्-ये देवताओं, पितरों तथा मनुष्यों का कोई उपकार
नहीं करते इससे ये ‘किंकृत’ हैं, और ‘किंकृत’ कहे जाते हुये
‘कीकट’ कहे जाने लगे ।
अथवा-जिनकी ऐसी प्रेप्सा-अभिप्राय है, कि- “ किं
क्रियाभिः ” क्या क्रियाओं से (कर्मों से) है, [ किन्तु कोई
फल जन्मान्तर में नहीं है । ] वे मनुष्य ( नास्तिक जन ) ‘किं-
क्रिय’ कहे जाते हुये ‘कीकट’ कहे जाने लगे ।
‘घर्म’ क्या ? हर्म्य उन धनाढ्यों के स्थान, जो वैदिक
अग्नि वाले मनुष्य हैं, जिनके घर अग्निहोत्रादि कर्मोंसे नित्य
ही गरम रहते हैं । अथवा घर्म क्या ? महावीरपात्र । क्यों ?
घरण होनेसे । क्योंकि-उसमें दूध झरता है । ‘घृ’ क्षरणादीप्त्योः
( जु० प० ) धातु से है ।