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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 546, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 546

हिन्दी निरुक्त (१२८) ५ अ० १ पा० ३ खं०
“सोमो अक्षः” (१३) ये दो पद है। इन में “अक्षः” यह पद अनव-
गत है। और पक्ष में अनेकार्थ भी है। अर्थात् कुछ आचार्य ‘अश्नोति’ (व्याप्ति)
अर्थ, और कुछ आचार्य ‘क्षियति’ (गति) और ‘क्षरति’ (झरना) अर्थ मानते
हैं। किन्तु शाकपूर्णि सब स्थानों में क्षियति (गति) अर्थ ही मानते हैं। यही
पक्ष में अनेकार्यता है। यहां पर ‘सोम’ शब्द ‘अक्ष’ शब्द के साथ इस लिये
दिया है, कि—इस का उदाहरण “न यस्य द्यावा पृथिवी” यही मन्त्र बने ।
क्योंकि उस मन्त्र में “सोमो अक्षा” ऐसा ही विशिष्ट पाठ है। समाम्नाय के
आचार्यों के ध्यान में ‘अक्ष’ शब्द ‘अश्नोति’ का ही होना अच्छा है और वह
उक्त मन्त्र में भली प्रकार संगत होता है।
‘यस्य’ जिस इन्द्रकी महिमा को ‘द्यावा पृथिवी’ द्युलोक
और पृथिवी लोक ‘न’ नहीं ‘अक्षाः’ (अश्नुवाते) व्यापन करते
या पाते हैं। ‘न-धन्व’ न जल, ‘न-अन्तरिक्षम्’ न अन्तरिक्ष,
और ‘न-अद्रयः’ न पर्वत पाते हैं। किन्तु ‘सोमः-अक्षाः’ सोम
ही उसकी महिमा को व्यापन करता है। इस प्रकार कोई
‘अश्नोति’ पद का ‘अक्षाः’ शब्द मानते हैं।
“अनूपे गोमान्०” जब कोई ‘गोमान्’ गोओं वाला
‘गोभिः’ गोओं सहित ‘अनूपे’ सजल देशमें ‘अक्षा’ (क्षियति =
निवसति) निवास करता है ‘अथ’ तो उस देशके सुन्दर तृण
(घास युक्त होने से ‘दुग्धाभिः’ (पुनःपुनः ‘दुग्धाभ्यः’ अपि
गोभ्यः) बारबार दोही हुई भी गोओंसे ‘सोमः’ सोम ‘अक्षाः’
(‘क्षरति’ एव) झरता ही है। जिस वनमें ‘मत्साः’ मदयुक्त
‘लोपाशः’ छेदन-समर्थ गोएँ ‘सिंह’ सिंह के ‘प्रत्यञ्च’ (प्रति
अञ्चन्ति) साम्हने जाती हैं। [ऐसी गोओंकी महिमा जो
सुनते रहे, उसे आज इस मन्त्र में भी देखते हैं।]
मन्त्र में पहिला ‘अक्षाः’ पद ‘क्षियति’ (निवास) का