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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 98, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 98

६८ अ० १ पा० ३ ख० ६ ।
(नोट) इस प्रकार अनेक (ऊंचे नीचे) अर्थोंमें निपात समाहार
आते हैं।
वे सब लक्षण शास्त्रके अनुसार (निरुक्तकी रीतिसे) कौन
किस अर्थमें हैं सो देख लेने चाहियें।
( इति तृतीयः पादः समाप्तः )
२ यूपमें नियुक्त हुये शुनःशेपने अपने मोक्षकी इच्छासे इस गायत्री छन्दसे इन्द्रकी स्तुतिकी है।
हे इन्द्र ! जिस प्रकार कपोत (कबूतर) कपोतिका (कब्तूरी)
या अपने अण्डोंवाले घोंसलेके प्रति बार बार गिरता है उसी प्रकार
जिस सोमके प्रति तू नित्यकाल ही गिरता है, वही यह सोम
ऋत्विजोंसे तैयार किया हुआ है। इससे हमसे तुम्हारा यह क्या
प्रयोजन होगा ? हमे छुड़ा दे।
क्या हमारे बार बार रोते हुओंके स्तुतिरूप इस वचनके अभि-
प्रायको तू नहीं जानता ? कि हम किस प्रयोजनसे यह कह रहे
हैं। कौनसे तुम्हारे गुण इसमें नहीं आये, जिससे कि तू हमें इस
यूपसे नहो छुड़ाता है। अर्थात् यह सुन कर बुद्धिसे अर्थको जानकर
तथा हमारी आर्त्तता (पीड़ा) को निश्चय करके कारुण्य भावसे हमे
छुड़ा दे। भाव यह है कि हमसे हो तुम्हारा क्या प्रयोजन है;
जब कि हमसे भी बहुत उत्तम सोमरस तुम्हारे लिये अभिषुत
तैयार है।
१ ऐसा सुना गया है कि नारदजीने परीक्षार्थ असुरोंकी स्त्रियोंको उनके पतियोंमें
अश्रद्धा उत्पन्न करनेके लिये कुछ धोखेकी बात कही थी, उसीका उत्तर उन्होंने नारद
जीको इस मन्त्रसे दिया है।
कोई पुरुष देवताओके लिये पुरोडाश आदि रूप हवि देकर
इस लोकसे स्वर्गमें जाते हैं। कोई सोमयाग करके स्वर्गमें चले जाते
हैं, कोई स्तुति करके, एवम् कोई बहुत दक्षिणाओंके दानसे स्वर्गको
प्राप्त कर लेते हैं, इस रीतिसे भिन्न भिन्न उपायोंसे अपने अपने