निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 941, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिये हुये 'मधुना' ( घृतेन ) घृत से अथवा मध से और घृत
से 'अञ्जन्ति' चुपड़ते हैं। क्यों ? 'यत्' जिस से कि-'ऊर्ध्वः'
ऊपर को उठा हुआ ( ऊभा ) 'तिष्ठाः' ( स्थास्यसि ) खड़ा
होगा—अञ्जन ( चुपड़ने ) के पश्चात् तुझे सीधा खड़ा करेंगे।
और 'यद्वा' अथवा 'अस्याः' इस 'मातुः' माता = पृथिवी के
'उपस्थे' ( उपस्थाने ) ऊपर 'ते' तेरा 'क्षयः' स्थान ( गड्डा )
( कृतः ) किया गया है। [ इस कारण तू अवश्य ऊभो खड़ा
होगा। और खड़ा होकर प्रधान कर्म के अपूर्व (अदृष्ट) के
अङ्ग को साधन करके उसके द्वारा ( नः ) हमें 'इह' इस लोक
में 'द्रविणा' ( द्रविणानि ) धनों को 'धत्तात्' ( दास्यसि )
देगा ] ॥
'वनस्पति' अग्नि है, यह शाकपूणि कहते हैं।
“तस्य०” उसकी यह और तीसरी ऋचा है ॥३(१८)॥
(खंड४)
(निघ०-) “देवेभ्यो वनस्पते हवींषि हिरण्यपर्ण
प्रदिवस्ते अर्थम्। प्रदाक्षिणिद्रशनया नियूय ऋतस्य
वक्षि पथिभी रजिष्ठैः ॥” ( )॥
देवेभ्यो वनस्पतेः! हवींषि हिरण्यपर्ण ! ऋतपर्ण !
आपिवा उपमार्थे स्यात् हिरण्यवर्णपर्ण ! इति ।
“प्रदिवस्ते अर्थम्”पुराणः तेसः अर्थः, यं ते प्रब्रूमः।
यज्ञस्य वह पथिभिः ‘रजिष्ठैः’ ऋजुतमैः, रजस्व-
लतमैः, प्रपिष्टतमैः इतिवा ॥