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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 900, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 900

हिन्दी निरुक्त ( १३२ ) ८ अ० १पा० २खं

गूर्यात् स्वयमभिगूर्त्तया होत्रयर्तुभिः सोमस्य पि-
बत्वच्छावाक यज" ।
“होता यक्षद्देवम्” यह मन्त्र अच्छावाक ऋत्विज् के
प्रति प्रैष = प्रेरणा है । मैत्रावरुण बोलता है ।
अर्थः-‘होता' नाम ऋत्विज् ऋतुदेवताओं के मन्त्रों से
प्रैष्यकर्म में अध्वर्यु ( ऋत्विज् ) के द्वारा अतिप्रेषित = प्रेरित
हुआ 'द्रविणोदसं देवम्' द्रविणोदस् देवको 'यक्षत्' यजन
करे । वह द्रविणोदस् देव 'होत्रात् श्रपात्' होता ( ऋत्विज् )
के सम्प्रदान से = विधि से किये हुए दान से सोम को पी
चुका है । 'अपात् पोत्रात्' पोता (ऋत्विज् ) के सम्प्रदान से
सोम को पी चुका है । 'अपात् नेष्ट्रात्' नेष्टा (ऋत्विज् ) के
सम्प्रदान से सोमको पी चुका है । अब फिर यह 'तुरीयम्'
चौथा 'पात्रम्' सम्प्रदान पात्र है, जो 'असक्तम्' अशुद्ध या
अपूर्ण है, 'अमर्त्यम्' जिसे पीकर नहीं मरता अथवा जो
मनुष्य योग्य है- जिसे मनुष्य से अन्य ( देव ) पान कर सकते
हैं, उस 'इन्द्रपानम्' इन्द्र के पीने योग्य 'द्रविणसः' सोम के
पात्र को 'द्रविणोदाः स्वयम् आयूयात्' आप द्रविणोदस् देव
भले प्रकार मिलावे 'स्वयम् अभिगूर्यात्' आप उठावे फिर
'अभिगूर्त्तया होत्रया' अपनी चाही हुई स्तुति से दिया हुआ
जो 'सोमस्य' सोम का अंश, उसे 'स्वयम् ऋतुभि' पिबतु'
आप द्रविणोदस् देव ऋतु देवताओं के साथ पीवे 'अच्छावाक!
यज' हे अच्छावाक ! ( ऋत्विज् ! ) तू यजन कर, तू भी ऐसा
जान कर यजन कर ।
इस प्रकार इस इन्द्र के द्रविणोदस् नाम युक्त प्रैष मन्त्र