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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 899

हिन्दी निरुक्त ( १३१ ) ८ अ० १ पा० २ वं
मैं 'एनम्' इस इन्द्रदेवको 'ओजसः' किसी अतिमहान् बल
से 'जातम्' उत्पन्न हुआ 'मन्ये' मानता हूं । [ क्योंकि-यह
अतिबलवान् देखा जाता है । ] जो बलवान् होता है, वही
बलका दाता हो सकता है, इस लिये इन्द्र ही द्रविणोदाः है ।
और भी यह दूसरा हेतु इन्द्रके द्रविणोदस् होने में है-
मन्त्र का द्रष्टा = देखने वाला ऋषि अग्नि को द्राविणोदस
कहता है। [ "द्रविणोदाः पिवतु द्राविणोदसः"
जिसका पुत्र द्राविणोदस अग्नि है, वही द्रविणोदस् है ॥ ]
और यह अग्नि इसी इन्द्र से उत्पन्न होता है, प्रयोजन यह
कि- इन्द्रका ही पुत्र है। क्योंकि-
“यो अश्मनोरन्तरग्निं जजान" अर्थात् जिस
इन्द्र ने दो पत्थरों के भीतर अग्नि को उत्पन्न किया था।
यह भी निगम है।
"अथापि०" और भी यह दूसरा हेतु इन्द्र के द्रविणोदस्
होने में है। क्या ? ऋतुयाज मन्त्रों में- जिस से ऋतुओं का
यजन होता है, उन मन्त्रों में द्राविणोदस = द्रविणोदस् शब्द
वाले वचन हैं। उससे क्या ? उन मन्त्रों का जो पात्र होता
है,-जिससे उनका सम्बन्धी होम होता है, उस पात्र की
"इन्द्रपान" यह समाख्या = संज्ञा स्वयम् मन्त्र में आई
हुई है। जैसे-
"होता यक्षद्देवं द्रविणोदसम्-अपाद्धोत्रादपा-
त्पोत्रादपान्नेष्ट्रात्तुरीयं पात्रममृक्तममर्त्यमिन्द्रपानं
देवो द्रविणोदा द्रविणसः स्वयमायुष्यात् स्वयमभि-