निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीनिरुक्त । ८७
२—अर्थोपसं ग्रहायेत्याः इत्यर्थः । इस शास्त्रमें प्रायः 'कर्म' शब्द अर्थका पर्याय आता है ।
जैसे—"गतिकर्माण उत्तरे धातवः” ( ३, २, ३ ), यहां पर 'गतिकर्म' शब्दसे गत्यर्थ
प्रतीत होता है ।
३—पदमेव पूरयितव्यं येषा मतु कश्चिदभिधेयोऽर्थ इति पदपूरणाः । जिन निपातोंसे पद
अथवा पादकी पूर्ति मात्र ही होती है, किन्तु कोई अभिधेय अर्थ नहीं होता वह पद
पूरण कहाते हैं । इस प्रकार अर्थके भेदको लेकर संक्षेपसे निपातोंके तीन विभाग
होते हैं ।
४ हे सखो ! सहनशील इस शत्रुओंके तिरस्कार कालके उपस्थित होने पर हमसे बुलाया हुआ
तू हमारी सेनाका नेता हो , और उसके पश्चात् अग्निके समान तेजस्वी प्रदीप्त होकर
तू हमारे शत्रुओंका तिरस्कार कर, तथा उनको मारकर उनके धनको लेकर हमारे
सैनिकोंके बलको बढाते हुये योग्यतानुसार बांट दे । और मरनेसे बचे हुये, जो
शत्रु योद्धा हमसे धनको लौटाना चाहते हैं, उनको तावन्मात्र शेष करके तू दूर
फेंक दे जिससे कि फिर वे न आवें ।
५ 'इहैवैधि मापच्योष्ठाः पर्वत इवाविचाचलिः । इन्द्र इवेह ध्रुवस्तिष्ठे ह राष्ट्रमृधारय ॥'
इस अनुष्टुप् छन्दसे आङ्गिरस ध्रुवने राजाका अभिषेक किया था ।
इसी राष्ट्रमें तू रह, और तू पर्वतके समान क्रियाशून्य मत हो, तथा इन्द्रके समान ध्रुव
होकर स्थित हो, और विभूतिसम्पन्न इस राज्यको धारण कर ।
६ अग्निके समान तीक्ष्ण ।
७ इन्द्रके समान विक्रमवाला है ।
८ आदित्यकी रश्मियोंने इन्द्रको अपना तेज या दीपन करने वाला नहीं माना ।
९ “हृत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो न सुरायाम् । ऊधर्न नग्ना जरन्ते ।” [ ऋ० सं० ५,
७, १६, १ ] कण्व मेधातिथि और आङ्गिरस प्रियमैध दो ऋषि । इन्द्र देवता ।
गायत्री छन्द । वाचस्तोमेमें विनियोग ।
(नोट) जिन मन्त्रोंका कहीं भी विनियोग नहीं है, वे भी वाचस्तोमेमे विनियुक्त होते हैं ।
पान किये हुये सोम हृदयमें स्थित होकर अपनी अपनी श्रेष्ठताको कहते हुये परस्पर
युद्ध करते हैं जैसे मदिरा पानेसे उन्मत्त हुये कोई पुरुष युद्ध करें । इसके अतिरिक्त
आत्मलाभसे परितुष्ट होकर उसी यजमानकी स्तुति जैसी करते हैं; जिस प्रकार
रात्रिके समय पुरुष नग्न होकर स्त्रीके सं'योगके लिये उसकी स्तुति करते हैं ।
१० आचार्य ऐसा कह सकता है और कौन ऐसा कहेगा ।
११ दहीके समान भात है ।
१२ कुल्माष भी ले जा, और जानेकी तो बात ही क्या है ।