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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 831, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 831

हिन्दी निरुक्त ( ६१ ) ७ अ० ३ पा० १० सं०
किया, तथा “एतन्नरराष्ट्रमिव” इस दृष्टान्त से सब
पक्षों की गौण मुख्य भाव से एकवाक्यता सिद्ध की है। फिर
देवताओं के आकार का प्रश्न, जिसमें पुरुषाकारता, अपुरुषा-
कारता, कर्मार्थ आत्मा की उभयविधता, और नित्य उभय-
विधता रूपमे चार प्रकार के आकारों की मन्त्रप्रामाण्य से व्य-
वस्था दी है। फिर देवताओं का नैरुक्तों के मतसे भक्तिसाहचर्य
विस्तारसे निरूपण किया है। फिर 'मन्त्र' 'छन्दस्' 'यजुः' 'साम'
और 'गायत्री' आदि शब्दोंके निर्वचनसे मन्त्रों के सामान्य
विशेष स्वभाव दिखाये हैं फिर अब इस खण्डमें इस दैवतकाण्ड
के उपोद्घात को पूरा करते हैं और जो कुछ देवता सम्बन्ध
में अवशिष्ट है, संक्षेप से कहदेते हैं, इसी बात की सूचना के
लिये खण्ड के आरम्भ में “इति इमाः” 'इति' शब्द दिया
है। अथवा पूर्वोक्त प्रकार की सूचना के लिये यह 'इति' शब्द
दिया है-जिस लक्षण जिस से, संख्या से, जिस आकार से ये
देवता कहे गए हैं, वे सब देवता संक्षेपसे फिर चार प्रकार
के हैं-सूक्तभाक्, हवि र्भाक्, ऋग्भाक्, और निपातभाक्।
अर्थात्-इनस्वभावों को लेकर भी देवताओंका विभाग करना,
ये स्वभाव भी सब के समान नहीं हैं। जो सूक्तभाक्-सूक्तों
से स्तुति किये जाते हैं, उनका समूह अलग है, जो हविर्भाक्
हैं, जिनको हविः दिया जाता है, वे अलग हैं, जो ऋग्भाक्
(अर्द्धर्चभाग्, ऋक्पादभाक्) हैं, वे अलग हैं, किन्तु ये
औरों की अपेक्षा से संख्या में बहुत अधिक हैं (जैसे धनाढ्य
कम और अल्पधन अधिक होते हैं) और ऐसे ही कोई
देवता ऐसे हैं, जो निपातभाक् हैं- दूसरों के स्तोत्र में गौण
रूप से आते हैं। यह चौथा देवताओं का विभाग अलग