निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 829, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंवृत्रतुर् (वृत्र को भगाने वाले) इन्द्र के लिये "इन्द्राय—
अंहोमुचे" पाप को छुड़ाने वाले इन्द्र के लिये ( एकादश-
कपालं निर्वपेत् ) ग्यारह कपालों के पुरोडाश को देवे ।
"तान्यपि०" उनको भी कोई ( आचार्य ) समाम्नान
करते हैं- निघण्टु शास्त्र में पढ़ते हैं- देवताओं के इन्द्र आदि
प्रधान नामों के समान उनके विशेषण 'वृत्रहन्' 'वृत्रतुर्' और
'अंहोमुच्', आदि शब्दों को भी निघण्टु में संग्रह करते हैं !
"भूयांसि तु समाम्नानात्" किन्तु (उनके) समाम्नान
करने से बहुत नाम हो जावेंगे ?
"यत्तत्संविज्ञानभूतं" मैं तो जो संविज्ञानभूत =
प्रकृति, प्रत्यय आदि संस्कारों से बनाहुआ और प्रधान्य से
स्तुति वाला नाम है, उसे समाम्नान करता हूं ।
"अथोत०" और भी ऋषि कर्मों से देवताओं की स्तुति
करता है-'वृत्रहा' वृत्र को मारने वाला, 'पुरन्दर' पुर दैत्य
को मारने वाला, (इत्यादि ।) उनको भी (कर्मनामों = गौण
नामों को भी) कोई आचार्य समाम्नान करते हैं ।
"भूयांसि तु समाम्नानात्" किन्तु (उनके) समा-
म्नान से बहुत हो जावेंगे ।
"व्यञ्जनमात्रन्तु०" वह तो विशेषणमात्र है-उस (प्रधान)
नाम का । जैसे बुभुक्षित (भूखे) ब्राह्मण के लिये भात दे,
नहाए के लिये अनुलेपन (चन्दन) प्यासे के लिये पानी, यह,
(यहां 'ब्राह्मण' इस प्रधान नाम के साथ 'बुभुक्षित' आदि
नाम विशेषण हैं ।) ॥ १० (१३) ॥