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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 820, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 820

लोको, माध्यन्दिनं सवनं, ग्रीष्मः, त्रिष्टुप्, पञ्चदश-
स्तोमः, बृहतसाम, ये च देवगणाः समाम्नाता मध्यमे
स्थाने, याश्च स्त्रियः, अथास्य कर्म-रसानुप्रदानं, वृत्र-
वधः, याच काच बलकृतिः, -इन्द्रकर्म एवतत्। अथा-
स्य संस्तविका देवाः अग्निः, सोमः, वरुणः, पूषा, बृह-
स्पतिः, ब्रह्मणस्पति, पर्वतः, कुत्सः विष्णुः, वायुः।
अथापि मित्रो वरुणेन संस्तूयते, पूष्णा रुद्रेण च
सोमः, अग्निना च पूषा, वातेन च पर्जन्यः ॥३(१०)॥
अर्थ :- अब ये इन्द्रकी भक्ति (भाग) हैं- अन्तरिक्ष लोक,
माध्यन्दिन सवन, ग्रीष्म ऋतु, त्रिष्टुप् छन्दः, पञ्चदश स्तोम,
बृहत् साम, और जो देवगण मध्यम स्थान पे समाम्नान
(परिगणन) किये हैं, और जो स्त्रियें। अब इसका कर्म- जल
बरसना, वृत्रका वध, और जो कोई बलकृति (बलकर्म) वह
इन्द्रका ही कर्म है। अब इसके संस्तविक देव-अग्नि, सोम, वरुण,
पूषा, बृहस्पति, ब्रह्मणस्पति, पर्वत, कुत्स, विष्णु, वायु, हैं।
और भी मित्र वरुण के साथ स्तुति किया जाता है, पूषा
और रुद्र के साथ सोम, और अग्नि के साथ पूषा और वात
के साथ पर्जन्य स्तुति किया जाता है ॥३ (१०)॥
व्याख्या
यह इन्द्र भक्ति का खण्ड है। इस में और देवता का
प्रसंग न आना चाहिये, तथापि मित्र आदि देवताओं के
संस्तविक देवता बताये हैं, यह याज्ञक मत के अनुसार
दिखाये हैं, । नैरुक्तों के मत में तीन देवताओं के अतिरिक्त
अन्य देवता नहीं है और न किसी का संस्तविक देवता ही है
सुतराम् व्युत्पत्ति के लिये मतान्तर दिखाया गया है ॥३(१०)॥
(खं० ४)
(निरु०-) अथैतानि आदित्यभक्तीनि-असौ लोकः,
तृतीयसवनं, वर्षा, जगती, सप्तदशस्तोमः, वैरूपंसाम,