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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 819, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 819

हिन्दी निरुक्त ( ४८ ) ७ अ० २ पा० ३ खं०
दुरोणे० " [ ऋ० सं० ३, १,२५, ४ ] यह ऋचा इन्द्र के
साथ अग्नि के संस्तव की है। "अग्नीषोमाविमं सुमे०"
[ ऋ० सं० १,६, २८, १ ] यह ऋचा सोमके साथ अग्नि की
स्तुति की है।
“आग्नावैष्णवं हविः "। यह भी देवता का एक
स्वभाव है। अग्नि देव विष्णुदेव के साथ हविः के भागी
होते हैं- "अग्नाविष्णू सजोषसा वर्द्धन्तु वां गिरः"
इस ऋचा का वामदेव ऋषि, गायत्री छन्दः, और आग्ना
वैष्णव (अग्नि विष्णु के) हविः में विनियोग है, इस ऋचा में
यद्यपि विष्णु के साथ अग्नि की स्तुति है, किन्तु इस का
हविः में विनियोग है, इस से यह संस्तविकी नहीं है, हविः
की ही है।
“आग्नापौष्णं हवि ! ०" पूषा के साथ भी अग्नि
का हविः ही है, संस्तव नहीं। वह ऋचा "पूषात्वेतश्च्या-
वयतु०" (ऋ०सं० १, ६, २३, ३) यह है। इस एक
ही ऋचामें अग्नि और पूषा दोनों की स्तुति है,परन्तु भिन्न २
वाक्यों में है और उनका कार्य भी भिन्न २ ही है। अर्थात्-
पूषा मृत को इस लोक से अलग करता है, और अग्नि उसे
देव लोक में पहुंचाता है यही पूर्व हविः से इस हविः में
विलक्षणता है। वहां अग्नि और विष्णु दोनों का एक संबोधन
और वाणी की वृद्धि रूप एक कार्य है॥ २ (६) ॥
( खं० ३ )
(निरु०-) अथैतानि इन्द्रभक्तीनि- अन्तरिक्ष-