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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 810, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 810

अपि वा पुरुषविधानामेव सतां कर्मात्मानः एते
स्युः, यथा यज्ञो यजमानस्य ॥
एष च आख्यानसमयः ॥ ३ [७] ॥
इति सप्तमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ ७, २ ॥
( खं० २ )
( देवताओं के आकार की चिन्ता । )
अर्थः- “ अथ० ” यहां से देवताओं के आकार का
चिन्तन होता है ।
“ पुरुषविधाः० ” पुरुष सरीखे ( देवता ) हैं-देवता-
ओं का आकार पुरुषों जैसा है। यह एक ( मत है ) ।
( इस मत की युक्तिएं )
(क) “ चेतनावद्वद्०” क्योंकि-चेतनावानों की जैसी
स्तुतिएँ होती हैं।
(ख) “ तथा० ” वैसे ही अभिधान या संवाद हैं-
संवाद सूक्तों में मनुष्यों के समान प्रश्न उत्तर देखे जाते हैं।
(ग) “ अथापि० ” और भी पुरुषों के जैसे अङ्गों से
स्तुति किये जाते हैं ( जैसे-) “ ऋष्वात० ” हे इन्द्र !
तुम महान् के शत्रुओं के नाश करने वाले दोनों भुजाओं की
हम उपासना करते रहें ।
“ यत्संगृभ्णा० ” हे मघवन् ! इन्द्र ! जो तू (अपार
द्यावापृथिवीओं को ) पकड़लेता है, तेरी मुष्टि (मुट्ठी ) बड़ी
है । [ अ० ६, पा० १ खं० २ ]

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य) · पृष्ठ 810, कुल 1282 में से · SarvaKosh