निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १७ ) ७ अ० १ पा० ३ खं०
(निरु०-) (ख) “ तम आसीत्तमसागूल्हमग्रे ”
( ऋ०सं० ८, ७, १७, ३ )
‘ तमः ’ अंधेरा ही था, अति अंधेरे से ( सब ) ढंका
हुआ था ।
छठा विशेष-
(निरु०-) अथापि परिदेवना कस्माच्चिद्भावात् ॥
और भी किसी कारण से विलाप भी मन्त्रोंमें होता है ।
उदाहरण-
( निरु०- ) “ सुदेवो अद्य प्रपतेदनावृत् ” ॥
( ऋ० सं० ८, ५, ३, ५ )
पुरूरवा ऋषि, त्रिष्टुप् छन्दः, परिदेवना ।
‘सुदेवः’ वह शोभन ( अच्छा ) देव है, जो इस प्रिया
उर्वशी से वियुक्त होकर ‘अद्य’ आज ही ‘प्रपतेत्’ गिरे,-ऐसा
गिरे कि ‘अनावृत्’ फिर संसारमें न लौटे। यहां ऋषि विषय
लम्पटता के दुःखरूप परिणाम की स्थिति को दिखाता है,
कि लोक इसे भले प्रकार जानकर इस में न फंसे ।
और विलाप का उदाहरण-
(निरु०-) “न विजानामि यदि वेदमस्मि” इति ॥
दीर्घतमा ऋषि और अस्यवामीय सूक्त ।
“न विजानामि” मैं यह अच्छी तरह नहीं जानता,
“यदि वा इदम् अस्मि” मैं यह कारण ब्रह्म हूं, या
उसका कार्य रूप द्वैत जगत् । यहां पर संशय ही विलाप है ।
सातवां और आठवां विशेष-