निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें' हिन्दी निरुक्त ( १६ ) ७ अ० १ पा० ३ खं०
सोम" यह पचीस (२५) ऋचाओं का सूक्त जपा जाता है,
उसकी पन्दरहवीं ऋचा है (सा०भा०)
"यदि यातुधानः अस्मि" यदि मैं वशिष्ठ राक्षस
हूं "अद्यामुरीय" तो आज ही मरजाऊं ।
शाप को उदाहरण-
[ निरु०- ] “अधा स वीरैर्दशभि र्वियूयाः"
इति ॥ ( ऋ० सं० ५, ७, ७, ५) ॥
'अध' यदि ऐसा होकि-' मैं वसिष्ठ और तू राक्षस' तो
सो तू आज ही दश पुत्रों से वियुक्त होजा ।
पांचवां विशेष-
[ निरु०- ] कथापि कस्याचिद् भावस्य आचि-
ख्यासा ॥
और भी मन्त्रोंमें किसी भावके कहने की इच्छा होती है ।
उदाहरण-
[ निरु०- ] [क] “न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि"
( ऋ० सं० ८, ७, १७, १ )
त्रिष्टुप् छन्द, परमेष्ठी नाम प्रजापति ऋषि, आकाश
आदि पदार्थों की सृष्टि स्थिति और प्रलय आदि यहां प्रति-
पादन किये जाते हैं, इससे उनका कर्त्ता परमात्मा देवता
और विनियोग पूर्वके तुल्य । (सा० भा० )
'तर्हि' इस जगत् की जब उत्पत्ति न हुई थी, तब मृत्यु
नहीं था, क्योंकि- उस समय मरने वाला मनुष्य आदि कोई
नहीं था । और 'अमृत' अमरपणा भी नहीं था, क्योंकि-
मृत्यु नहीं था ।