निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (७) ७ अ० १ पा० ३ सू०
'इन्द्रः' माध्यमिक देव (पर्जन्य) 'दिवः ' द्युलोक को
'ईशे' (ईष्टे) ईशन करता है शासन करता है, 'इन्द्रः (एव)
इन्द्र ही 'पृथिव्याः' पृथिवी को 'ईशे' ईशन करता है या
शासन करता है ॥
द्वितीया में उदाहरण-
[ निरु०- ] " इन्द्रमिद् गाथिनो बृहत् "
[ ऋ० सं० १, १, १३, १ ]॥
इस ऋचाका मधुच्छन्दस् ऋषि और महाव्रत में महदुक्थ
शिरस् पे शस्त्र (शस्त्रावयव) है ।
'गाथिन. !' (सामगाः) हे सामके गान करने वालो '
'इन्द्रम् इत्' (इन्द्रम्-एव) इन्द्र को ही 'बृहत्' (बृहतां
साम्ना) बृहत् साम से (अभिष्टुत) आभिमुख्यसे स्तुति करो ।
तृतीया में उदाहरण--
(निरु०) "इन्द्रेणैते तृत्सवो वेविषणाः"
(ऋ० सं० ५, २, २७, ५)।
इस ऋचा का वसिष्ठ ऋषि, इन्द्र देवता महाव्रत मे
निष्केवल्य दक्षिण पक्ष में शस्त्र है ।
'एते' (मेघाः) ये मेघ 'इन्द्रेण' इन्द्रसे 'तृत्सवः' (दारयितव्याः)
विदारण करने योग्य 'वेविषाणाः' और व्याप्यमान होते
हुए (आप इव) जलों के समान (केनचित् सृष्टाः) किसी से
प्रेरित हुये (नीचीः) नीचे २ (अगच्छन्) चले गए ।
चतुर्थी में उदाहरण-
[ निरु०- ] "इन्द्राय साम गायत" (ऋ०मं०
६, ७, १, १) ।