निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ६ ) ७ अ० १ पा० २ खं०
प्रकृति दोनों ही प्रकार का होता है, किन्तु अधिकांश पुरुष-
प्रकृति । एवम् देवता भी ऋषि होता है, तथा अन्य दिव्य
पुरुष भी । ऋषि मन्त्र का कर्त्ता या आद्य वक्ता नहीं होता
किन्तु उनका उस मन्त्र में ऋषित्व यही होता है, कि उसे
उस मन्त्र का तपोबल से दर्शन हुआ है । मन्त्र स्वतः अनादि
तथा नित्य है । " द्रष्टार ऋषयः " (का०सर्वा०कं० १)
अर्थात्-मन्त्रके द्रष्टा या साक्षात्कार करने वाले ऋषि होते हैं।
देवता । प्रत्येक मन्त्र या सूक्त आदिमें वही देवता होता
है, जिसकी वहां स्तुति हो, तथा प्रार्थित अर्थ का प्रभु कहा
गया हो ।
फलका सम्बन्ध ।
मन्त्र में जिस फल की प्रार्थना की गई होती है, वह
प्रार्थना यद्यपि ऋषि की ओर से होती है, तथापि ऋषि का
सम्बन्ध नित्य मन्त्र में दर्शन मात्र से होता है, इस से उसका
फल प्रयोग करने वाले अधिकारी को होता है ! क्योंकि-नित्य
मन्त्रका दर्शन तपोबल से कल्पान्तर में दूसरे ऋषि को भी
हो सकता है, इसी से उसका फल ऋषि में आबद्ध नहीं ॥१॥
( खं० २ )
प्रथमा विभक्ति में परोक्षकृता ऋचाका उदाहरण-
[निरु०- ] " इन्द्रो दिव इन्द्र ईशे पृथिव्याः"
[ ऋ० सं० ८, ४, १५, ५ ] ॥
इस ऋचा का वैश्वामित्र (विश्वामित्र का पुत्र ) रेभ
ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द और सूर्य्यस्तुत्येकाह निष्केवल्यमें विनि-
योग है।