निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३४० ) ६ अ० ६ पा० ३ खं०
“इन्द्रो यातृना मभवत्पराशरः ” ‘ इन्द्रः ’ इन्द्र
देव ‘यातूनाम्’ राक्षसों का ‘पराशरः’ बड़ा नाश करने वाला
‘अभवत्’ हुआ । यह भी निगम है ॥
‘ क्रिविर्दती ’ ( १२२ ) अनवगत शब्द ‘विकर्तन-दन्ती’
( काटने वाले दांतों वाली ) के अर्थ में है ।
“ यत्रा वो दिद्युद्रदति क्रिविर्दती ” अर्थात्-
‘यत्र’ जिस मेघमें ‘ क्रिविर्दती ’ काटने में समर्थ दांतों वाली
‘दिद्युत्’ (आयुध-विशेष) ‘रदति’ काटती है । यह भी निगम
है । यहां अर्थ के अनुसार ‘ क्रिविर्दती ’ शब्द आयुध का
नाम है ॥
‘करूलती’ ( १२३ ) अनवगत ) शब्द ‘कृत्तदती’ ( कटे
हुये दांतों वाली ) के अर्थ में है ।
अथवा किसी कटे हुये दांतों वाले देवता को देखकर
ऋषि ने ऐसा कहा है- ॥ २ ( ३० ) ॥
( खं० ३ )
निघ०-दनः ॥१२४॥ शरारुः ॥१२५॥
इदंयुः ॥१२६॥
निरु०-“ वामं वामं त आदुरे देवो ददात्वर्यमा ।
वामं पूषा वामं भगो वामं देवः करूलती ॥ ”
(ऋ० सं० ३, ६, २३, ४ )
‘वामं’ वननीयं भवति ।
‘आदुरिः’ आदरणात् ।