निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २५२ ) ६ अ० २ पा० २ खं०
और उन्हों के भीतरी भेदों को ‘प्रकला’ कहते हैं । ]
“दुर्मित्रासः प्रकलविन्मिमानाः” अर्थात्—‘दुर्मित्राः’
सुमित्र होकर भी अधिक सोच विचार रखने वाले (कंजूस)
‘प्रकलविदः’ (वणिजः) बाणिए, वे जिस प्रकार ‘मिमानाः’
माप कर देते हुए [अल्प (कम) देते हैं] यह भी निगम है ।
‘अभ्यर्द्धयज्वा’ (२६) (अनवगत) ‘अभ्यर्द्धयन्यजति’ (जो
बढाता हुआ यजन (दान) करता है) के अर्थ में है ।-
“सिषक्ति पूषा अभ्यर्द्धयज्वा” अर्थात्—‘पूषा’ सूर्य
अपनी रश्मियों (किरणों) से ‘अभ्यर्द्धयज्वा’ बड़े दान वाला
‘सिषक्ति’ सेचन करता (बरसता) है। यह भी निगम है ।
‘ईक्षे’ (२७) (अनवगत) ‘ईशिषे’ (तू प्रभु होता है) के
अर्थ में है ।-
“ईक्षे हि वस्व उभयस्य राजन्” अर्थात् हे राजन् !
राजमान देव ! हि’ क्यों कि—(त्वम्) तू ‘उभयस्य’ द्युलोक
और पृथिवी लोक के ‘वस्वः’ (वसुनः) धन का ‘ईक्षे’ (ईशिषे)
स्वामी है। यह भी निगम है । यहां धन के सम्बन्ध से ‘ईक्षे’
‘ईशिषे’ के अर्थ में सिद्ध होता है ।
‘क्षोणस्य’ (२८) (अनवगत) ‘क्षयस्य’ (घर के) के
अर्थ में है ।-
“महः क्षोणस्याश्विना कण्व्राय” अर्थात् ‘अश्विना’
हे (अश्विनौ !) अश्विनौ ! ‘कण्वाय’ कण्व ऋषि के लिये
‘महः’ (महतः) बड़े ‘क्षोणस्य’ (क्षयस्य) घर के (दातारौ) देने
वाले हो । यह भी निगम है ॥ यहां दानके सम्बन्ध से ‘क्षोण’
नाम घरका है ॥ २ (६) ॥