निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३५१ ) ६ अ० २ पा० २ खं०
निरुक्तार्थ-मैं कारूं हूं या थां । 'कारूं' क्या ? स्तोमों
( स्तुतियों ) का करने वाला । ( मेरा ) 'तत' भिषक् ( वैद्य या
ब्रह्मा ) था । 'तत' यह सन्तान का नाम है । अथवा पिताका
अथवा पुत्र का । 'उपलप्रक्षिणी' सक्तुओं को बनाने वाली ।
'नना' 'नम' (स्वा० पँ०) धातु से है । अथवा माता । अथवा
पुत्री । 'नानाधी क्या ? नानो (अनेक) कर्मों के करने वाले ।
'वसूयु' क्या ? वसुओं धनों की कामना वाले । हम लोक के
प्रति गोओं के समान अनुचर रूप से स्थित थे । हे इन्दो !
( सोम ! ) तू इन्द्र के लिये झर । यह अध्येषणा ( सत्कार-
पूर्वक किसी पूज्य या प्रतिष्ठित को प्रेरणा ) है [ इस मन्त्र में
अपने दोषों को अपने मुख से कहने की महानुभावता और
एक जीव के अनेक जन्मों का निदर्शन मिलता है तथा जन्म-
कृत जाति की पुष्टि होती है, या जन्म का आत्मा पर बहुत
काल तक पूरा प्रभाव रहता है, इत्यादि बातो का स्पष्ट
वर्णन हैं । ]
'उपसि' (२४) अनवगतं 'उपस्थे' ( ऊपर के स्थान में )
के अर्थ में है ।
“आसीन ऊर्ध्वा मुपसिक्षिणाति" अर्थात्-'आसीनः'
मध्यस्थान में बैठा हुआ इन्द्र 'ऊर्ध्वाम्' ऊपर स्थित हुई
द्युलोक रूप गो को 'उपसि (उपस्थे) अपने ऊपर ( अन्तरिक्ष
लोक में ) 'शिक्षति' (क्षारयति ) क्षारता है ॥ 'उपस्थे ऊपर
के स्थान में ॥
'प्रकलेवित्' (२५) (अनवगत ) वणिक् ( वाणिज्य करने
वाला ) होता है । क्यों ? वह कलाओं को और प्रकलाओं को
जानता है । [ 'कला' उपयोगी चतुराई के कामों को कहते हैं,