निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंताप अर्थ में 'तप' ( भ्वा०प० ) धातु से है । [ क्योंकि-वह
ताप देने वाली होती है । ]
'हेति' हिंसात्मक 'हन्' ( अदा० प० ) धातु से है । क्यों
कि-उससे हनन किया जाता है । ]
'कत्पयम्' (७) यह अनवगत है । 'कपयम्' यह अवगत है ।—
" 'त्यम्' (तम्) उस (मेघ) को 'चित्' (अनर्थक) 'कत्पयम्'
(सुखपयसम्) सुखकारी जल वाला बनाकर 'शयानम्' (असूर्यम्)
प्रकाश रहित करके (जघान) मारा" । [ 'यहां इन्द्र ने मारा'
इस संबन्ध से 'कत्पयः' सुखपयः (सुखजल) सिद्ध होता है । ]
'विस्रुह' (८) जल होते हैं । [क्योंकि-] विशेष कर स्रुत
होते (झरते) हैं ।
" 'वयाः' (शाखाः) शाखाओं के 'इव' समान [पृथिवी के
ऊपर] 'सप्त' फैलने वाले सात 'विस्रुहः' जल (समुद्र) 'रुरुहुः'
नदी आदि के रूप से फैले हुए हैं।" यह भी निगम है ।
'वीरुध्' (६) (अनवगत) ओषधिएं होती हैं । क्यों ?
विरोहण (पृथिवी को भेदकर उगने) से ।
" 'वीरुधः' ओषधिएं 'पारयिष्णवः' (तारयिष्णवः) रोगों
से पार करने वाली हों" यह भी निगम होता है । [ इस मन्त्र
में 'पुष्पवती' आदि विशेषणों के सम्बन्ध से 'वीरुध्'नाम ओ-
षधियों का सिद्ध होता है । ]
'नक्षदाभम्' (१०) यह अनवगत है ।—
'नक्षदाभ' अश्नुवानदाभ होता है । क्यों कि-वह अ-
भ्यश्न (अपने व्यापने) से मारता है ।
“नक्षदाभं ततुरिं पर्वतेष्ठाम्” अर्थात्- 'नक्षदाभम्'
अपने व्यापने से मारने वाले 'ततुरि' त्वरा (शीघ्र) स्वभाव