निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३३८ ) ६ अ० १ पा० ४ खं०
अर्थः- हे 'इन्द्र !' यह 'अलातृणः' ( अलमातर्दनः )
भिगोने को समर्थ (जलसे भराहुआ) 'वलः' मेघ ( क्यों ?
'वृणोति' आवरण करता है ) 'व्रजः' ( अन्तरिक्षे व्रजंति )
अन्तरिक्षमें चलने वाला 'गोः' (एतस्याः माध्यमिकाया वाचः)
इस आपकी मध्यम लोक की वाणी गर्जना से 'हन्तोः' ( हन-
नात् ) मारने से 'पुरा' पहिले ही 'भयमानः' डरता हुआ
'व्यार' (विश्नथी भवति) ढीला हो जाता है, यो होगया ।
तथा उस (मेघ) ने 'गाः' (गवाम्) (अपाम्) जलों के 'नि-
रंजे' (निरजनाय ≈ निर्गमनाय) निकलने के लिये 'पथः' (मा-
र्गान्) मार्गों को 'सुगान्' ( सुगमनान् ) सुन्दरगमनयोग्य
'अकृणोत्' ( अकरोत् ) किया । और निकले हुए 'वाशीः'
(आपः) जल ( क्यों ? वहन (बहने) से ) 'पुरुहूतम्' (जलाशयम्)
जल के स्थान कूप तडाग नदी आदि को 'धमन्तीः' जाते हुए
'प्रावन्' रक्षा करते हैं ॥
'पुरुहूत' क्यों ? वह 'पुरुभिः' (बहुभिः) बहुतों से 'हूतम्'
(आहूतम्) बुलाया हुआ होता है । 'धम' (ध्मा) (भ्वा० प०)
धातु का गमन अर्थ है ॥ ३ ( २ ) ॥
( खं० ४ )
(निघ०-) सललूकम् ॥६॥ कत्पयम् ॥७॥
विख्रुहः ॥८॥ वीरुधः ॥६॥ नक्तुद्दाभम्॥१०॥
अस्कृधोयुः ॥११॥ निश्टम्भाः ॥१२॥
(निरु०-) “उद्दर्हरक्षः सहमूलमिन्द्र वृश्चामध्यं प्रत्य-
ग्रं शृणीहि । आकीवतः सललूकम् चकर्थ ब्रह्मद्विषे
तपुषिं हेतिमस्य ।” ( ऋ० सं० ३, २, ४, २ )