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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 493

हिन्दी निरुक्त ( ७४ ) ४ अ० ३ पा० ३ खं०
पत्थर की 'वाशीभिः' ग्रावों (पात्रविशेषों) से 'तक्षत'
संस्कार करो (कूटो) ।
दूसरा अर्थ-हे उन्नेतः ! 'हरिम्' उस हरे सोमरस को इस
कलश से 'द्रोः-उपस्थे' द्रोणकलशके ऊपर 'आसिञ्च' झार ।
और तुम भी हे होताओ ! सींचेजाते हुए इस सोम को 'अश्म-
न्मयीभिः' व्यापन होती हुई 'वाशीभिः' स्तुतियों से 'तक्षत'
संस्कार करो ।
निरुक्तार्थ—द्रुम-मय या काठ के पात्र के ऊपर हरिको
भली प्रकार सींच । 'हरि' नाम सोम हरे रंग का । यह दूसरा
भी 'हरि' (वानरका नाम) इसी व्याख्यान से है। [क्योंकि-
वह भी हरे रंग का होता है। रामायण में कहा है—
“शिरीषकुसुमप्रख्याःकेचित्पिङ्गलकप्रभाः, वानराः”
अर्थात् कोई सिरस के फूलके रंग के और कोई पीले वानर थे ।
“तक्षताश्मन्मयीभिः” इस मन्त्र में 'वाशीभिः' पदके
पत्थर के पात्रों से अथवा बाणियों (स्तुतियों) से इस प्रकार
दो अर्थ होते हैं ।
'विषुणा' (४५) (विषमः) इस अनवगत पद का निगम—
“ स शर्द्धदर्यो विषुणस्य ००” [ऋ० सं० ५, ३,
३,५ ] अर्थात्-हे इन्द्र ! 'सः' वह 'शर्द्धत्' (हमारे यज्ञ में)
आसके, जो 'अर्य्यः' जितेन्द्रियहो, और 'विषुणस्य' (विषमस्य)
यज्ञ के विध्वंस करने वाले 'जन्तोः' मनुष्य के (दबाने में
समर्थ हो ।) किन्तु-'शिश्नदेवाः' ब्रह्मचर्य्य से रहित पुरुष 'नः'
हमारे 'ऋतम्' यज्ञ में या सत्य में 'मा' न 'अपिगुः' आवें ।
निरुक्तार्थ-वह उत्साह करे जो विषुणा (विषम) यज्ञ
के विध्वंस करने वाले का। न शिश्नदेव या अब्रह्मचर्य से