निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 455, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३६ ) ४ अ० १ पा० ६ खं०
मार कर ‘शत्रूयताम्’ शत्रुता करने वालोंके ‘भोजनानि’ अन्नों
को ‘आभर’ ले आ ॥
निरुक्तार्थः-‘अतिथि’ क्यों ? घरों के संमुख जाता है ।
अथवा तिथियों में पर कुलों को जाता है। अथवा घरों को ।
( यह भी दूसरा अतिथि इसी से है । ) ‘दुरोण’ यह घर का
नाम है। क्योंकि? वे दुरव या दुस्तर्प [जिनमें कितना ही कुछ
लाकर रखो भरते ही नहीं] हैं। जानने वाले (आप) इस हमारे
यज्ञ को आओ । हे अग्ने ! सब साम्हना करने वालों को
मार कर, वैर करने वालों के भोजनों को, अथवा औरों के
बलों को नष्ट करके शत्रुओं के घर से भोजनों को ले आ ।
अथवा धनों को ॥
‘मूषः’ (६) । ‘मूष’ का मूषिका या मूसिए'-यह अर्थ है ।
‘मूषिका’ चोरी अर्थ में ‘मुष्’ (क्र्या० प०) धातु से है। [क्यों
कि- वे धान्य आदि द्रव्यों को चोरते हैं ।] ‘मूष’ भी इसी
धातु से है । ॥५॥
१ ( ६ खं० )
[निरु०-] “संमा तपन्त्यभितः सपत्निरिव पर्शवः
मूषो न शिश्नाव्यदन्ति माध्यः स्तोतारन्ते शतक्रतो
वित्तंमे अस्य रोदसी ॥” [१, ७, २१, १०५]
[ भा०-] सन्तपन्ति माम् अभितः सपत्न्यइव इमाः
पर्शवः, कूपपर्शवः । मूषिका इवास्नातानि सूत्राणि
१- “संमातपन्ति” इति आप्त्यस्य त्रितस्य कुत्सस्यवेयमा-
र्षम् । पङ्क्तिश्छन्दः । ऐन्द्री एषा ।