निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३५ ) ४ अ० १ पा० ५ ख०
(भा०) 'अतिथिः' अभ्यातितो गृहान् भवति ।
अभ्येति तिथिषु परकुलानि-इति वा । गृहाणि-
इति वा । (अयमपि इतरः अतिथिः एतस्मादेव)
'दुरोण' इति गृहनाम । दुरवा भवन्ति, दुस्तर्पाः ।
[२यपा०] “ इमं नो यज्ञ मुपयाहि विद्वान् ”
[३यपा०] सर्वा अग्ने अभियुजो विहत्य [४र्थपा०]
शत्रूयताम्आभर भोजनानि । [ व्याख्यान्तरम् ]
विहत्य अन्येषां बलानि, शत्रूणां भवनात् आहर
भोजनानि-इति वा । धनानि-इतिवा ।
'मूषः' (६) मूषिका इत्यर्थः । 'मूषिकाः' पुनः
मुष्णातेः । 'मूषो' ऽपि एतस्मादेव ॥५॥
अनुवादः ।
मन्त्रार्थः- हे भगवन्! अग्नि देव! 'जुष्टः' हमसे स्तुतियों
द्वारा सेवा किया हुआ, 'दमूनाः' कठोर मन न हुआ हुआ,
या 'यह मेरा घर है' ऐसा मानता हुआ अथवा 'इन्हें देनाही
चाहिये'-ऐसा मन करता हुआ, अथवा 'दमन शीलों में तेरा
मन है, और वैसे है,-यह जानता हुआ, 'अतिथि' सांझ सवेरे
अग्निहोत्रियों के अतिथि (सद्यमान' 'विद्वान्' हमारी भक्ति
को जानने वाला 'नः' हमारे 'दुरोणे' घर में 'इमम्' इस 'यज्ञम्'
यज्ञ को 'उपयाहि' आ । [और-] हे अग्ने ! अग्नि देव !
'विश्वा' सब 'अभियुजः' सामना करने वालों को 'विहत्य'