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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 392, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 392

तृतीय पादकी उपमाका चित्र ।

उपमा वाचक पदउदाहरणअर्थअ०पा०खं०
(१) इव ।“तनूत्यजेव”...(ऋक्) देहत्यागी जैसे३३२
”“विधवेव”...(ऋक्) विधवा जैसे३३३
(२) न ।“मर्यं न”...(ऋक्) मनुष्यको जैसे ।३३३
”“अग्नि र्न”...(ऋक्) अग्निके समान ।३३४
(३) यथा ।“यथावातः”...(ऋक्) पवन जैसे ।३३४
”“अग्नयो यथा”...(ऋक्) अग्नियों जैसे ।३३४
”“जीवगृभो यथा”...(ऋक्) जीवको लेनेवालेके जैसे ।३३४
(४) चित् ।“चतुरश्चिद्ददमानात्”(ऋक्) चार अक्षोंके लेनेवालेसे जैसे ।३३४
(५) आ ।“आ भगम्”...(ऋक्) भग (रस या योनि) जैसे ।३३४
(६) भूतः ।“मेषो भूतः”...(ऋक्) मेढा जैसा ।३३४
(७) रूपम् ।“हिरण्यरूपः”...(ऋक्) सुवर्ण जैसा ।३३४
(८) था ।“प्रत्नथा”...(ऋक्) चिरन्तनोंको जैसे ।३३४
(६) वत् ।“ब्राह्मणवत्”...(ऋक्) ब्राह्मण जैसे ।३३४
”“प्रियमेधवत्”...(ऋक्) प्रियमेधके जैसे ।३३५
इति तृतीयः पादः ॥ ३ ॥ ३ ॥