निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ ३ अ० २ पा० ५ खं० ।
अर्थ ।
“त्वयावयम्” मन्त्रका गृत्समद ऋषि । जगती छन्दः । प्रवर्ग्यमें
विनियोग ।”
मन्त्रार्थ—हे ब्रह्मणस्पति देव ! सुन्दर बढ़ानेवाले तुमसे हम
वाञ्छनीय धनोंको दाता मनुष्योंसे लेवें । दूर देशमें जो शत्रु और
जो निकट देशमें शत्रु हमें तिरस्कार करते हैं उन कर्महीन या रूप
हीन शत्रुओंको तुम नाश करो ॥
नि० अ०—हे ब्रह्मणस्पति देव ! तुझ बढ़ानेवालेके कारणसे
वाञ्छनीय धनोंको मनुष्योंसे लेवें । जो हमारे दूर देशमें और
तडित् या निकटमें शत्रु हैं, हमें वाञ्छित अर्थों को देनेवालेके रोकने
वाले या स्वयम् देना नहीं चाहने वाले उन दोनों कुरूपोंको तुम
बेचेत करो । [ एक पदानि ] ‘अप्नस्’यह रूपका नाम है ‘आप्नोति’
व्यापन करता है, इस कतृ वाच्य क्रियासे है, ‘तडित्’ विद्युत् या
बिजली होती है यह शाकपूर्णि आचार्य मानते हैं । क्योंकि वह
ताडन करती है और दूरसे दिखाई देती है । किन्तु यह अन्तिक
या समीपका ही नाम अभिप्रायसे हो सकता है । [ उदाहरण ]
“दूरमें भी रहता हुआ समीपमें जैसा स्थित हुआ दिखाई पड़ता
है।” [ यहाँ ‘तडित्’ शब्दक समीप वाचकता अत्यन्त स्पष्ट है । ]
वधकर्म धातुओंके अनन्तर अठारह ( १८ ) वज्रके नाम हैं ।
‘वज्र” किस धातुसे है ? ‘वर्जयति’ इस ( चु० उ० ) कर्तृ वाच्य
धातुसे है । अर्थात् यह प्राणियोको प्राणोंसे वियुक्त कर देता है ।
[सन्देह-पद-] उन वज्र नामोंमे ‘कुत्स’ यह पद ‘कृतो’ छेदने
( तु० प० ) धातुसे है । ‘कुत्स’ ऋषि ( भी ) है । क्योंकि वह
स्तोम नाम कर्मों का करनेवाला है, यह औपमन्यव आचार्य मानते
हैं। इस ( ऋषि ) अर्थमें भी इस धातुका 'वध' अर्थ ही है ।