निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । २५
अपि च—यदि आख्यातमें सर्वत्र भाव—प्रधानता ही होती
तो पाणिनि मुनि उक्त सूत्रमे कर्त्ता और कर्मके अतिरिक्त भावमें
लकारको क्यो विधान करते ?
यद्यपि यहां एक आपत्ति और हो सकती है ! वह यह है—
कि—आख्यातकी द्रव्य—प्रधानता शब्दानुशासन तक है, फिर
अपना कार्य करके लोकव्यवहारमे शब्दके आनेसे पहले ही
वह लय हो जाती है ? तथापि उसके लिये यह कहा जा सकता
है कि—वह पीछे किस कारणसे लय हो जाती है, और उसके
लय होने मे क्या प्रमाण है ?
यदि कोई प्रमाण तुम्हारे पास अनिवार्य होता तो प्रथमान्त-
विशेष्यक शाब्दबोध माननेवाले नैयायिक तुमसे अलग क्यो होने ?
इससे सार यह निकला कि—आख्यात हो या नाम जहां
भाव-वाचक प्रत्यय होगा, वही भाव-प्रधानता है, अन्यत्र नही ।
जैसे—'देवदत्तेन भूयते' पच्यते, 'ओदनेन पच्यते, कृतिः भूतिः
भवनम्, भावः, पाचकता, पाठकता इत्यादि !
उत्तर—यह ठीक है कि—आख्यातपद भाव, क्रिया, काल
और संख्याके समान द्रव्यका वाचक भी होता है, तथापि उन
सब अर्थोमे भावकी ही प्रधानता रहती है, इसके लिये विशेष-
प्रत्ययाधान आदि बहुत युक्तिया दी जाचुकी हैं, इसलिए यहा अन्य
विस्तारकी उपेक्षा की जाती है ।
प्रकृत्यर्थकी प्रधानता ।
और
प्रत्ययार्थकी अप्रधानता ।
आख्यातके चार विभाग हे, कर्तृ-वाचक, कर्म-वाचक, भाव-