निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ अं० १ पा० १ खं० १ । •
इसके अतिरिक्त 'देवदत्तः पचति' 'ओदनः पच्यते' ( 'देवदत्त
पकाता है, ओदन पकाया जाता है) इन वाक्योंमें द्रव्यवाचकता
या द्रव्यके सामानाधिकरण्यके कारण क्रियामें विकृति होती
है, अन्यथा उस विकृतिका मूल ही क्या है।
अपि च "लः कर्मणि च
भावे चाकर्मकेभ्यः” “कर्त्तरि शप्” ।
इत्यादि अनेक पाणिनि सूत्र इसका साक्ष्य भी देते हैं कि-
आख्यातमें द्रव्य-वाचकता रहती है।
लिङ्गकी विकृतिका अभाव भी पूर्णरूपसे प्रमाण नहीं हो
सकता कि--'आख्यात द्रव्यवाचक नहीं', क्योंकि कति और
युष्मद्-अस्मद् आदि बहुत द्रव्यवाचक शब्द ऐसे है, जिनमें लिङ्ग
की विकृति नही देखी जाती जैसे-'त्वं पुमान्' 'त्वंस्त्री' 'त्वं ब्रह्म'
'कति पुरुषाः' 'कति स्त्रियः' 'कति कुलानि' इत्यादि ।
• यह कहें कि-- कति आदि शब्दोमे लिङ्ग है, किन्तु प्रतीत
नहीं होता, तो हम भी 'पचति' आदिके लिये यह कह सकते है,
इस लिये यह शब्दका स्वभाव है कि-कहीं लिङ्गकी विकृति
प्रतीत होतो है, और कहीं नहीं।
जब कि-पच् धातुसे लट् लकार होता है, और वह 'शतृ'
आदेश होनेकी अवस्था में द्रव्यवाचक स्वीकृत है, तो तिप् आदेश-
की अवस्था में उस लट्के अर्थको कौन उड़ा ले जायगा, या
उड़ भी जाता है, तो उसमें क्या प्रमाण है ?
अपि च 'देवदत्तः पचति' यहा पर पचति द्रव्यवाचक नहीं
तो देवदत्त शब्दमें प्रथमा विभक्तिका क्या मूल है ? और पचति
पचसि तथा पचामि में पुरुष नियम किसने किया ?
• यदि इन सब बातोंका मूल निकालेंगे तो आप समझेंगे कि-
आख्यातमें द्रव्य-वाचकता है, या द्रव्य-प्रधानता है, या नहीं।