निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० २ अ० १ पा० ४ खं० ।
मुदी च्येषु । संवस्-एक-पदानि निर्ब्रू यात् । अथ
तद्धित समासेषु एक पर्व सु च अनेक पर्व सु च
पूर्वं पूर्वम् अपरम् अपरं प्रविभज्य निर्ब्रू यात् । दण्ड्यः
पुरुषः, दण्डमर्हति, -इति वा । दण्डेन सम्पद्यते
इति वा । दण्डः, -ददतेः धारयति कर्म्मणः ।
“अक्रूरो ददते मणिम्”—इति अभिभाषन्ते । 'दम-
नात्'—इति औपमन्यवः । 'दण्ड मस्या कर्षत'—
इति गर्हायाम् ॥ ४ ॥
अर्थः—
'शवति' क्रिया-रूप, गति-अर्थमें कम्बोज या म्लेच्छ देशोंमें ही
बोला जाता है । [ उदाहरण विशेषमें आये हुए शब्दका निर्वचन-]
'कम्बोज' नामसे कम्बलों को सेवन करनेवाले या सुन्दर पदार्थोंको
खानेवाले-[ बोले जाते हैं । ] [ विग्रहमें आया हुआ शब्द-] 'कम्बल
नाम वाऽउनोयका होता है । इस 'शवति' धातुकी 'शव' इस
विकृति या नाम पदको आर्य-देश ( हिन्दुस्थान ) में बोलते हैं ।
'दाति'—क्रिया छेदन अर्थमें प्राच्य या पूर्वी देशोंमें बोली जाती है ।
'दात्र' जो इसको विकृति है, उदीच्य या उत्तरी देशोंमें बोली जाती
है । इस प्रकारसे एक-पद या अखण्ड-पदोंकी व्याख्या करे ।
इसके अतिरिक्त एक पदवाले अथवा अनेक पदवाले तद्धित और
समासोंमें पहिले पहिले और पिछले पिछलेको अलग अलग करके
निर्वचन करे । [ जैसे-] 'दण्ड्यः पुरुषः,' जो पुरुष दण्डके योग्य
हो । अथवा दण्डसे सिद्ध किया जावे । [ पदार्थ—निर्वचन—]
'दण्ड'-शब्द धारणार्थक 'दद्' ( भ्वा० आ० ) ध तुसे होता है ।