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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 186

हिन्दी निरुक्त । १६
जैसे—"उष्णं घृतम्" 'उष दाहे' (भ्वा० पा०) धातु है । यह
प्रायः वेदमें प्रसिद्ध है ।—"प्रत्युष्ट ँरक्षः प्रत्युष्टा अरातयः” ( य०
वा० स० १, ७, ) इत्यादि ।—और भाषामें 'उष्ण' शब्द बोला जाता
है । यह नैगम शब्दके सादृश्य पर निर्वचन किया जाता है । ऐसे
ही-'घृक्षरग दीप्त्योः' (भ्वा० प०) धातु है, उसका—"आत्वा
जि घर्मि” ( य० वा० सं० ११, २३ ) इत्यादि-वेद वाक्योंमे प्रयोग
प्रसिद्ध है, और भाषामें 'घृतम्' पद व्यवहृत होता है, सो यह
वैदिक 'घृ' धातुसे ही निर्वचनीय है। इस प्रकारसे 'लौकिक
शब्दोंसे वैदिक शब्द और वैदिक शब्दोंसे लौकिक शब्दों का निर्वचन
करना चाहिये ।
निर्वचनमें विभिन्न देश भाषाओंका परिज्ञान ।
निर्वचन करनेवालेको और यह एक बात ध्यानमे रखनी चाहिये
कि—"कुछ देशोमे धातु शब्दोंकी प्रकृति ही बोली जाती है, और
कुछ देशोंमें विकृति” । धातुका आख्यात पदके रूपमें जो प्रयोग
है, वह प्रकृति कहाता है, क्योंकि—पहिले-"सब नाम आख्यातसे ही
उत्पन्न होते हैं” । इस सिद्धान्तके द्वारा आख्यातको कारण बता
चुके है । और 'नाम'के रूपमें जो धातुका प्रयोग होता है, वह
उसकी विकृति है, यह बात भी उपर्युक्त सिद्धान्तसे ही आ
जाती है ॥ ३ ॥
( ख० ४ )
शवतिर्गतिकर्मा, कम्बोजेषु-एव भाष्यते ।
कम्बोजाः, कम्बलभोजाः, कमनीय भोजा वा ।
कम्बलः कमनीयो भवति । विकार मस्यार्येषु भा-
षन्ते शव इति । दातिर्लवनार्थे प्राच्येषु, दात्र-