सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 177

हिन्दी निरुक्त। ६
अथापि आद्यन्त विपर्य्ययो भवति ! । स्तोकाः ।
रज्जुः। सिकताः । तर्कि, इति । अथापि अन्तव्याप-
त्तिर्भवति ॥ २ ॥
अर्थः-
और ‘अस्’ भुवि ( अदा० प०) धातुके गुण और वृद्धिके अभाव-
स्थलमें आदिवर्णका लोप होता है। [जैसे-] स्तः। सन्तिः । और
अन्तके वर्णका लोप होता है। [जैसे-] गत्वा । गतम् । ‘गम्लृ’
गतौ, (भ्वा० प० ) धातुके ‘त्वा’ प्रत्यय और ‘क्त’ प्रत्ययमें ‘म्’
कारका लोप होता है। और उपधाका लोप होता है। जग्मतुः ।
जग्मुः । [यहां ‘गम्लृ’ गतौ धातुके उपधा अकारका लोप होता
है।] और उपधा या अन्त्य वर्णसे पूर्व वर्णको विकार होता है।
[जैसे-] राजा। दण्डी । [ ‘राजन्’ ‘दण्डिन्’ इन शब्दोंमें ‘अ’
‘इ’ को दीर्घ होता है । ] और वर्णका लोप होता है। [जैसे-]
“तत्वायामि” [ ऋ० सं० १, २, १५, १ ] [ ऋ० सं० ५, ७, २६,४ ]
[ ‘त्वाम्’ के ‘म्’ कारका लोप होता है।] दो वर्णोंका लोप ।
[जैसे-] तृचः । [ त्रि+ऋच्में ‘र्’ और ‘इ’ का लोप होता है।]
और आदि अक्षर फेर बदला होता है। [जैसे-] ज्योतिः । [‘द्युत’
दीप्तौ, (भ्वा० आ० ) धातुके ‘द्य’ कारका ‘ज’ कारसे पलटा होता
है।] घनः । । [ ‘हन’ हिंसागत्योः, ( अदा० प० ) धातुका ‘ह्’ कार
‘घ’ कारसे पलटता है । ] विन्दुः । [ भिदिर् विदारणे (रु० उ० )
से।] बाध्यः । [ ‘भट’ भृतौ, (भ्वा० प० ) धातुसे होता है ।]
और आदि अन्त दो अक्षरोंका पलटा होता है। [जैसे ] स्तोकाः ।
[ ‘श्च्युतिर्’ क्षरणे, (भ्वा० प० ) धातुके ‘श्च’ कार ‘त’ कारका
बदला होता है।] रज्जुः । [ ‘सृज विसर्गे, (दि० आ० तु०
२