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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 176

८ २ अ० १ पा० १ खं० ।
चाहे-उपाय करें। * इसीसे वैयाकरणोंमें सर्व प्रतिष्ठित * पतञ्जलि
मुनिने कहा है कि—
“उपेय प्रतिपत्त्यर्थमुपाया अव्यवस्थिताः”—
जो वस्तु या कार्य तुझें करना है, उसके लिये उपाय नहीं है,
जिन उपायोंसे शीघ्रता तथा लाघवसे कार्य होसके उन्हीं उपा-
योंका तुम अवलम्बन करो ।
इसी विचारको दृढ़ करनेके लिये संक्षेपसे वैयाकरणोंके उपायों को
दिखा देते हैं, कि-उनके अनुसार नैरुक्तोंको भी सुभीता होगा, वे
भी शब्दों के निर्वचन कर्ममें उन उपायों का अवलम्बन करेंगे । तथा
वैसा करनेसे वैयाकरणोंके उपालम्भपात्र वनेंगे, एवम् उनके सादृश्य
पर और और उपाय भी कल्पित कर सकेंगे ॥ १ ॥
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( खं० २ )
अथापि अस्ते निवृत्ति स्थानेषु आदि लोपो
भवति । स्तः, सन्तः, इति । अथापि अन्त लोपो
भवति । गत्वा, गतम्, इति । अथापि उपधा लोपो
भवति । जग्मतु , जग्मुः, इति । अथापि उपधा
विकारो भवति । राजा, दण्डी, इति । अथापि वर्ण
लोपो भवति । “तत्वायामि” इति । द्विवर्ण
लोपः । तृचः इति । अथापि आदि विपर्ययो
भवति । ज्योतिः, घनः, विन्दुः, वाट्यः, इति ।
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  • यथोत्तर मुनीनां प्रामाण्यम् ।