निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । १५१
दूसरा उदाहरण—
“अग्निरिव मन्यो त्विषितः सहस्व” इति ।
( ऋ० सं० ८, ३, १६, २ )
जिस प्रकार पूर्वोक्त आग्नेय मन्त्रमें वायु और इन्द्र देवताका
लिङ्ग है, वैसे ही इस मन्य देवताके मंत्रमें भी अग्निका भी नैघण्टुक
वा गौण लिङ्ग है । ऐसे ऐसे अनेक देवताओंके लिङ्ग संकटस्थलोंमें
निरुक्त न पढ़नेवालोंको जिनको कि-मंत्रोंके व्याख्यानके नियम
विदित नहीं हैं, देवता तत्वका निर्धारण करना कठिन है ।
इससे मीमांसकोंका ऐसा कहना कि—“हम लिङ्गके ज्ञाता हैं,
हमें निरुक्तसे कुछ प्रयोजन नहीं है” यह अयुक्त है ।
त्विषि नाम दीप्तिका है । यद्यपि यह दीप्तिके नामोंमें पठित
नहीं है, किन्तु यह नियम नहीं है कि—“जो वहां जिस अर्थमें पड़े
हैं, वे ही उस अर्थ के वाचक हैं” अपितु और और शब्द भी उन
उन अर्थोंमें आसकते हैं ।
५वां प्रयोजन । शास्त्रमें ज्ञानकी प्रशंसा और अज्ञानकी
निन्दा है । ऐसी अवस्थामें “हम अनिन्द्य और प्रशंसनीय हों”
इसलिये निरुक्त शास्त्र ज्ञातव्य है । क्योंकि—निरुक्तशास्त्रसे
मन्त्रोंके अध्यात्म, अधिदैवत, तथा अधियज्ञ सब अर्थ जाने जाते
हैं, और वे अर्थ, परिज्ञात होकर मनुष्यके उत्तम कल्याणके लिये
होते हैं । इस रीतिसे यह शास्त्र अखिल पुरुषार्थोंके उपकारमें
समर्थ है, इस प्रयोजनसे इसका आरम्भ न्यायसे संगत है ।
( प्रमाण )—कहां ज्ञानकी प्रशंसा तथा अज्ञानकी निन्दा है—
( खं० २ )
स्थाणुरयं भारहारः किलाभूदधीत्य वेदं न
विजानाति योऽर्थम् । योऽर्थज्ञ॒इत्सकलं भद्रमश्नुते