निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (५२०) १२ अ० ३ पा० ११ खं०
करनेवाली या उत्पन्न करनेवाली है, वह और 'दिवः' 'द्युलोक
का 'धर्त्ता' धारण करनेवाला 'अजः च' एकपाद्' अज एक-
पाद् 'सिन्धुः' (च नदः) और सिन्धु नद् 'आपः' [च] और
जल 'समुद्रियः' [समुद्रियाश्च] और समुद्र के जल "विश्वे
देवासः” (सर्वे च देवाः) और सब देवता 'सरस्वती च) और
सरस्वती (ये सब देवता] 'धीभिःसह" (कर्मभिःयुक्तानि)
कर्मों से युक्त 'पुरन्ध्या' (स्तुत्या प्रयुक्तानि) स्तुति से प्रेरित
'वचांसि' (इमानि वचनानि) इन वचनों को 'शृणवन्' (शृण्व-
न्तु) सुने [इति] यह हम चाहते हैं
'पवि' क्या ? शल्य (लोहे का धार वाला फल जो बाण
आदि अस्त्र शस्त्रों के अग्र में रोपा जाता है) होता है । क्यों ?
'विपुनाति कायम्' शरीर को विदारण कर देता है । 'तद्वत्
पवीरम्' वह (पवि) जिसमें लगा हुआ होता है, वह 'आयुध'
'पवीर' होता है । 'तद्वान् इन्द्रः पवीरवान्' उस [पवीर] का
रखने वाला इन्द्र 'पवीरवान्' होता है क्यों कि-
“अतितस्थौ पवीरवान्” [ऋ० सं० ८,१,२४,३]
अर्थात् पवीरवान् इन्द्र शत्रुओं को दबा कर खड़ा हुआ था
या है । यह भी निगम है ।
'तद्देवता वाक् पावीरवी' वह इन्द्र जिसका देवता है,
सो पावीरवी है । क्या ? 'दिव्या वाक् द्युलोक की वाणी ॥
“दिवो धर्त्ता” द्युलोक का धारण करने वाला । 'अज
एक पाद्' देवता का यह (दिवोधर्त्ता) विशेषण होने से यह
द्युलोक स्थान का देवता है, यह मन्त्राक्षरों से ही निश्चित
होता है ॥