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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1270, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 1270

हिन्दी निरुक्त ( ५०९ ) १२ अ० ३पा० ६खं०
प्रत्यङ् इदं सर्वम् उदेषि, प्रत्यङ् इदं सर्वम् इदम्
अभिविपश्यसि-इति ।
अपिवा एतस्यामेव ॥ ५ (२४) ॥
अर्थः- हे वरुण ! पावक! जिस ख्याति या प्रज्ञा से या
जिस अनुग्रह बुद्धिसे सुकृती जनों के पीछे जाते'हुये अग्नि-
मान् जन को देखता है, उसी ख्याति या बुद्धि से "प्रत्यङ्
देवानां विशः" देवताओं के निवासों को प्रत्यङ् = अभि-
मुख या संमुख करके 'उदेषि' तू उदय होता है "प्रत्यङ्
उदेषि मानुषान्" मनुष्यों के सामने करके उदय होता है
"प्रत्यङ् विश्वं स्वर्दृशे" हे स्वः ! आदित्य ! ( प्रत्यङ्
इदंसर्वम् उदेषि ) इस सब जगत् को सामने करके तू उदय
होता है [प्रत्यङ् इदं सर्वम् अभिविपश्यसि] इस सब जगत्
को तू अभिमुख देखता है ॥
"अपिवा०" अथवा यदि पूर्व ऋचा में भी एक वाक्यता
न हो, और उत्तर ऋचा में भी एक वाक्यता न हो, तो भी
इसी प्रस्तुत ऋचा में व्याख्यान होसकता है ॥५ (२४)॥
(खं० ६ )
निरु०- "येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ
अनु त्वं वरुण पश्यसि ॥"
तेन नो जनान् अभिविपश्यसि ॥
'केशी' केशाः रश्मयः, तैः तद्वान् भवति ।
काशनाद् वा । प्रकाशनाद् वा ।

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य) · पृष्ठ 1270, कुल 1282 में से · SarvaKosh