निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें•हिन्दी निरुक्त ( ४५७ ) ११अ० ४पा० १०खं०
“तस्याः०” उस (अघ्न्या) की यह ऋचा है ॥९[४३]॥
(खं० १०)
“निरु०- सूयवसाद्भगवती हि भूया अथो
वयं भगवन्तः स्याम । अद्धि तृणमघ्न्ये विश्व-
दानीं पिव शुद्धमुदकमाचरन्ती ॥” (ऋ० सं०
२, ३, २१, ५) ॥
सुयवसादिनी भगवती हि भव अथ इदानीं वयं
भगवन्तः स्याम, अद्धि तृणम् अघ्न्ये ! सर्वदा
पिव च शुद्धम् उदकम् आचरन्ती ॥
तस्य एषा अपरा भवति ॥१०[४४]॥
अर्थः- “सूयवसाद्भ०” इस ऋचा का ऋषि पूर्व के
समान है । माध्यमिक वाक् से कहाजाता है—
'अघ्न्ये !' हे अघ्न्ये ! नहीं मारने योग्य ! या अघ
[पाप] को नाश करने वाली ! मध्यम लोक की वाक् ! 'सूयव-
सात्' [सुयवसादिनी] सूयव [जल] को अपना आत्मा बनाकर
या अपने अधीन करके [त्वम्] तू 'भगवती' [धनवती उदकेन]
[जल से धन वाली 'भूयाः' [भव] हो 'अथो' [अथ] [इदानीम्]
अब तुझे भगवती या धनवती होते ही 'वयम्' हम 'भगवन्तः'
[धनवन्तः] धन वाले 'स्याम' होवें । हे अघ्न्ये ! 'तृणम्' (मेघम्)
मेघको 'अद्धि' [संचूर्णय] भले प्रकार विदारण कर । 'विश्वदानी'म्
(सर्वदा) (च) और सब काल में 'शुद्धम्' शुद्ध 'उदकम्' जल
को 'आचरन्ती' सब अन्तरिक्ष में विचरती हुई 'पिब' पी
(पानकर) ॥