निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३६६ ) १० अ० ४ पा० ४ खं०
बहुत कालतक जीने के अर्थ (मनः धारय) मनको धारणकर ।
'नः' ( अस्माकम् ) हमारी 'आयुः' आयुको 'सुप्रतिर' (प्रकर्षेण
वर्द्धय) भले प्रकार बढ़ा । 'नः' ( अस्मान् ) और हमें 'रारन्धि'
( रन्धय— (च) ) साधन कर या साधले । और ऐसा अनुग्रह
कर जिस प्रकार हम 'सूर्यस्य' सूर्य के 'सन्दृशि' (सन्दशर्नाय )
भले प्रकार दर्शन के लिये समर्थ होवें हमें दिव्य दृष्टि दे,
जिससे सूर्य के संदर्शन में समर्थ हों । और 'घृतेन' ( उदकेन )
जलसे 'त्वम्' तू 'तन्वम्' अपने शरीर को 'वर्द्धयस्व' बढ़ा—
अर्थात्-यथा समय वृष्टि करने से यह सब होगा, इसी से तू
बरस ।
'रध' ( दि०प०) धातु वशगमन ( अधीन चलने ) अर्थ
में भी देखा जाता है । जैसे-
" मा रधाम द्विषते सोम राजन् "
अर्थात्- हे भगवन् ! सोम ! राजन् ! तुझसे विशेष रूप
से कहा जाता है कि—'द्विषते' शत्रुके 'मा' न 'रधाम' वश हों
इन उक्त प्रार्थनाओं के लिये हम शत्रुओं के अधीन नहीं,
किन्तु वे ही सब प्रकार हमारे अधीन हों । क्योंकि-शत्रुके
अधीन होना बहुत अनिष्ट है । यहां मन्त्रार्थ के सामर्थ्य से
'रध' धातु वश गमन अर्थ में स्थिर होता है ।
'ऋत' शब्द की व्याख्या ( २, ७, ३ ] की जाचुकी है ।
“तस्य०” उसकी यह ऋचा है—॥ ३ (४०) ॥
( खं० ४ )
निरु० " ऋतस्य हि शुरुधः सन्ति पूर्वी ऋत-
स्य॒धीति॒ र्वृ॑जि॒नानि॑ ह॒न्ति॒ । ऋतस्य श्लोको