निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३६० ) १० अ० ३ पा० १० खंड
'स्तूपः' स्त्यायतेः। सङ्घातः ।
सवितः !.यथा त्वा आङ्गिरसः जुह्वे, वाजे अन्ने
अस्मिन्, एवं त्वा अर्चन्अवनाय वन्दमानः
सोमस्यऽइव अंशुं प्रति जागर्मि अहम् ।
'त्वष्टा' व्याख्यातः,तस्य-एषा भवति ॥९(३३)॥
अर्थ:-“ हिरण्यस्तूपः” इस ऋचा का अर्चन् नामक
हिरण्यस्तूप ऋषि है।
हे 'सवितः' 'यथा' जिस प्रकार दूसरे कल्प के 'आङ्गिरसः'
अङ्गिरस् के पुत्र हिरण्यस्तूप ऋषि ने 'त्वा'तुझे 'जुह्वे' [आजु-
हाव] आवाहन किया 'एवा' वैसे ही ' अस्मिन् ' इस 'वाजे'
[संस्कृते हविषि] बनाये हुये हविः में 'अहम्' मैं इस कल्प का
'अर्चन्' अर्चन् नामा हिरण्यस्तूप ऋषि 'अवसे' (अवनाय)
रक्षा के लिये 'त्वा' तुझे ' वन्दमानः' वन्दना करता हुआ
सोमस्य- इव अंशुम् सोम के अंशु [ रस ] को खरीद
कर जैसे 'प्रतिजगरा' [जागर्मि]जागता हूं- यज्ञ पर्यन्त तेरी
उपासना करता हूं ॥
'हिरण्यस्तूप' क्या ? हिरण्य (सुवर्ण) का स्तूप (समूह)
अथवा हिरण्यमय (सुवर्ण का) स्तूप (कीर्त्ति स्तम्भ) जिसका
हो वह हिरण्यस्तूप है ।
'स्तूप' किस धातु से है ? संघात अर्थ में 'स्त्यै[वा०प०]
धातु से ।क्या ? संघात ।
'त्वष्टा' (२१)शब्द की व्याख्या[२,७,५] हो चुकी । उस
की यह ऋचा है ॥६(३३)॥