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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1080, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 1080

हिन्दी निरुक्त ( ३१५ ) १० अ० २ पा० ३ खं०
“तस्य०” उस वास्तोष्पति की यह ऋचा है-॥३(१६)॥
व्याख्या ।
‘जामि’ पदका मतभेद से लक्षण ।
‘जामि’ यह एक वैदिक संज्ञा है । अतएव यह अन्य
श्रौत तथा मान्त्रिक आवश्यक शब्दों के समान निर्वचनीय है
यद्यपि दैवत काण्ड में आनुपूर्वी से निघण्टुस्थ देवतानामों का
ही यहां निर्वचन होना उचित है, तथापि निरुक्त शास्त्र के
सकल शब्दों के अर्थ परिज्ञान में समुद्यम होने के कारण
मुख्य शब्दों में वे शब्द, जिनका निर्वचन या विचार किसी
विशेष व्युत्पत्ति को उत्पन्न करने वाला हो तथा जिसके
विचार का प्रभाव शास्त्र में व्यापक रूप से पड़ता हो । प्रसंग-
वश प्रकरण में आये हुये छोड़े नहीं जाते, यह आचार्य की
इस ग्रन्थनिर्माण में सार्वत्रिक ही विशेष शैली है। इसी से
यहां “क्षेत्रस्यपते” इस निगम में जामि पद भी आचार्य
का उपेक्षणीय नहीं है । क्योंकि-मन्त्रों में जामि अजामि
का प्रसंग प्रायः आता रहता है । 'जामि' यह वैदिक संज्ञा
है यह पहिले कहा गया है, तदनुसार भगवद्दुर्गाचार्य ने एक
श्रुति भी उद्धृत की है, जिसमें 'जामि' पद व्यवहृत हुआ है-
“जामि वा एतत्क्रियते यन्मरुत्वतीयो ग्रहो
गृह्यते मरुत्वतीयं शस्यते” अर्थात् - जामि ही वह
(यज्ञ) में किया जाता है, जो मरुत्वतीय ( मरुतों का ) ग्रह
ग्रहण किया जाता है, और मरुत्वतीय [ मरुतों का ] शस्त्र
किया जाता है ।