निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३१४ ) १० अ० २पा० ३ खं०
“यदेव समाने पादे०” जो ही पद एक पाद में दूसरे
पदसे व्यवहित = अन्तरित होकर समान या वैसे ही अर्थ में
फिर कहा जाता है, वही पद 'जामि' होता है । यह दूसरा
मत है । जैसे- “ हिरण्यरूपः सहिरण्यसंदृक् ” ।
क्योंकि-जो हिरण्य रूप होता है, वह अवश्य ही हिरण्य
जैसा होता है । अतः 'हिरण्यसंदृक्' यह पद जामि (पुनरुक्त)
होता है ॥
“ यथा कथा च विशेषः,अजामि भवति-इति
अपरम् ” । जिस किसी प्रकारसे भी जो कुछ भी = थोड़ा
भी विशेष = भिन्न अर्थ होने से अजामि होता है । (क्योंकि
वेदमें जैसा देखा जाता है, उसी का अनुविधान = अनुसरण
या निर्वाह किया जाता है । वह अपौरुषेय या ईश्वरीय वाक्य
है, उसमें भ्रान्ति आदि दोषों की आशङ्का का भी संभव नहीं
है, अतः ऐसा यत्न करना चाहिये, जिस प्रकार जामि पद का
फल निकल आवे । यत्किंचित् विशेष से भी वह अजामि हो
जाता है ।) यह अन्य मत-तीसरा मत है । जैसे- “ मण्डूका
इवोदकान्मण्डूका उदकादिव ”इति । अर्थात्- मेंढक
जैसे जलसे, मेंढक जलसे जैसे ॥
'वास्तोष्पति' (१) क्या ? 'वास्तु' (घर) निवास अर्थ में
'वस' ( भ्वा० प० ) धातु से है । क्योंकि-उसमें मनुष्य निवास
करते हैं । उसके पति ( पाता या पालयिता ) को 'वास्तो-
ष्पति' कहते हैं । ( सो यह ' वास्तोष्पति ' रुद्ररूप मध्यम
लोक का देवता है । क्योंकि-“अमीवहा०” इस मन्त्र में
बलकृति ( बलकर्म ) लिङ्ग पाया जाता है ।