निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३०७ ) १० अ० १ पा० १२ खं०
(अनपराधः) निरपराध 'उत [अपि] भी 'वृष्यावतः' (वर्ष-
कर्मवतः) बरसते हुए (इस मेघ से) (भीतः) डरा हुआ
'ईषते' (पलायते) भागता है, 'यत्' जब कि-'पर्जन्यः'
पर्जन्य देव 'स्तनयन्' गर्जता हुआ = वज्र को छोड़ता हुआ
'दुष्कृतः' (पापकृतः) पापकारियों को 'हन्ति' मारता है ॥
अर्थात्-जब पर्जन्य देव वज्रपात से पापकारियों को मारता
है, तो सभी मनुष्य हमें यह मारता है, इस बुद्धि से भागते
हैं । वह ऐसा । महानुभाव पर्जन्य हमारे लिये बरसे ॥
'महावध' क्यों ? इसका वध महान् है । क्योंकि-जिसे
मारता है, वह फिर बचता नहीं ॥
'बृहस्पति' (६) क्यों ? वह 'बृहतः पाता वा' इस
बृहत् (विस्तृत) जगत् को पालन करने वाला है । अथवा
'बृहतः पालयिता' (वही अर्थ है इससे 'बृहस्पति' है ।
“तस्य०” उस बृहस्पति की यह ऋचा है- ॥ ११ ॥
(खं० १२)
निरु०-“अश्नापिनद्धं मधु पर्यपश्यन्मत्स्यं न
दीन उदनि क्षियन्तम् । निष्कज्जभार चमसं न
वृक्षाद् बृहस्पति विरवेणा विकृत्य ॥” [ऋ०सं०
८, २, १८, २ ] ॥
अशनवता मेघेन अपिनद्धं मधु पर्यपश्यत् ।
मत्स्यम्-इव दीने उदके निवसन्तं निर्जहार तत्,
चमसम्-इव वृक्षात् ॥