निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३०५ ) १० अ० १ पा० १० खं०
कारण द्यावापृथिवी भी दोनों जिसके बलसे डरे । 'जनासः!'
हे असुरजनों ! “सः-इन्द्रः” वह इन्द्र है, मैं इन्द्र नहीं,
मैं ब्राह्मण हूं, मैं उसी के वर से उसके समान रूप को प्राप्त
हुआ हूं ॥
अनधिकार में किसी उत्तम सम्पत्तिका मिलना भी अनर्थ-
कारी हो सकता है, यह उपदेश इस मन्त्र के आख्यान से
मिल सकता है।
“ऋषेर्दैष्टार्थस्य०” जिसने इन्द्र देव की मैत्रीका अनुभव
किया है,उस इन्द्रके सखा गृत्समद् ऋषिकी यहप्रीति=स्तुति
आख्यान = इतिहास-संयुक्त है—गृत्समद् ने इन्द्र की प्रीति
को इतने परिमाण तक प्राप्त कियो था कि—वह इतिहासमें
गाई जाती है, इतिहास में स्थिर होगई है।
इससे आचार्य ने दिखाया कि- मन्त्रों का ऐतिहासिक
अर्थ भी ढूंढना—मन्त्रों में इतिहास सम्बन्धी भी अर्थ हैं।
'पर्जन्य' ( ५ ) शब्द तृप्ति अर्थ में 'तृप' (दि० प० )
धातु का उसके आदि और अन्त के अक्षरों को बदलने से है-
'तर्पयिता जन्यः' (सब देश का तृप्त करने वाला)। पूर्व भाग
'तृप्' धातु से और उत्तर भाग 'जन्यः' शब्द से है।
अथवा 'परो जेता' (बड़ा जीतने वाला) होने से 'पर्जन्य'
है । 'पर' शब्द से पूर्व पद और 'जि' (स्वा०प० ) धातु से
उत्तरपद है ।
अथवा ' परो जनयिता ' ( बड़ा उत्पन्न करने वाला )
वही पूर्वपद और 'जन' (दि०) धातु से उत्तर पद है।
अथवा 'प्रार्जयिता रसानाम्' (रसों को संग्रह करने