निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३०२ ) १० अ० १ पा० ६ खं०
तस्य एषा अपरा भवति ॥९॥
अर्थ :- “अदर्दः०” इस ऋचा का गातु आत्रेय ऋषि
है । हे भगवन् ! ‘इन्द्र !’ ‘त्वम्’ तैने ‘उत्सम्’ ( मेघम् ) मेघ
को ‘अदर्दः’ ( अहनाः ) फाड़ा, ‘अस्य’ इस (मेघ) के ‘खानि’
(बिलानि) छिद्रों को ‘वि-असृजः’ खोला, (त्वम्) तैने ‘अर्ण-
वान्’ ( अर्णस्वतः एतान् माध्यमिकान् बाबध्यमानान् संस्त्या-
यान् ) इन जल से भरे हुए मध्यलोक के मेघ समूहों को
‘अरम्णाः’ इकट्ठा किया है—वश में किया है, या रचा है,
या छोड़ा है । ‘यत्’ जोकि-‘महान्तम्’ बड़े ‘पर्वतम्’ ( मेघम् )
मेघको जो अन्य का खुले द्वार करना अशक्य था, ‘खि-वः’
( व्यवृणोः ) खोल दिया है,—उसके जल के बहाने वाले द्वार
खोल दिये हैं, उससे ‘दानवम्’ ( एनं उदकदातारं मेघम् )
इस जलके देने वाले मेघको ‘अव-हन्’ हनन करते हुए ने
‘तैने ‘धाराः’ धाराओं को ‘विसृजः’ छोड़ा है ।
‘उत्स’ (मेघ) कैसे ? उत्सरणा ( ऊपर को गमन ) करने
से । अथवा उत्सदन से—ऊपर को सन्न ( बैठा हुआ ) जैसा-
होने से । अथवा उत्स्यन्दन से ऊपर अवस्थित होकर स्यन्दन
करता है = बहता है, इससे ‘उत्स’ है । अथवा भिगोने अर्थ
में ‘उन्द्’ (रु०) धातुसे है । क्योंकि—वह सब जगत् को गीला
बना देता है इससे उन्दन करने से यह ‘उत्स’ है ।
“अरम्णाः” पद में ‘रभ’ ( क्रया० प० ) धातु संयमन
अर्थ में है। अथवा विसर्जन अर्थ में है ।
‘दानव’ क्या ? दानकर्मा = देने वाला ॥
“तस्य०” उस इन्द्र की यह और ऋचा है—पहिले कहा