निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २६७ ) ६ अ० ४पा० १ खं०
'मुसल' क्या ? मुहुःसर = बार २ चलने वाला ।
“तयोः”उन दोनों(उलूखल-मुसलों)की यह ऋचा है॥१(३५)॥
व्याख्या ।
“अथातः” यह अधिकार वचन है । यद्यपि अश्वादि
वर्ग का अधिकार अभी चलाही आता, है तो भी इनकी द्वन्द्व-
रूपता औरों से विलक्षण है,यह दिखाने के लिये फिर अधि-
कार वचन दिया है ।
“ अष्टौ ” इस पद के न होने से भी शब्दों के पाठ
से अष्टत्व ( ८ ) संख्या का ज्ञान हो सकता है, किन्तु आठ
ही द्वन्द्व हैं. न्यून या अधिक नहीं यह जनाने के अर्थ इस की
आवश्यकता है । आठ ही द्वन्द्वों के पाठ की यहां आवश्यकता
है, औरों की नहीं यह तात्पर्य है ॥
और द्वन्द्वों का पाठ क्यों नहीं ?
“उषासानक्ता ” “ दैव्याहोतारा” इनका अभी
देवताओं में पाठ हो चुका, अतः फिर समाम्नान होने से
पुनरुक्ति होगी ।
“मित्रावरुणौ” “अग्नीषोमौ” आदि और जो
द्वन्द्व हैं, उनमें मित्र, वरुण आदि एक २ देवताओं की अलग २
भी स्तुति मिलती है, इस कारण उनके पाठ में अपूर्वता न
होने से वे छोड़ दिये गए हैं, या इनकी गणना में नहीं
आसकते ।
यद्यपि पृथक् स्तुति के सादृश्य से “उलूखल-मुसल”
और “द्यावा-पृथिवी” इन का भी यहां पाठ न होना