निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २६६ ) ६ अ० ४ पा० १ खं०
के सम्बन्ध का इससे निराकरण नहीं होता । अतः औरों की
होने परभी इसका नाम होने से इसकी भी है, यह होसकता
है ॥ १३ ( ३४ ) ॥
इति हिन्दीनिरुक्तेनवमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥६,३॥
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चतुर्थः पादः ॥
( खं० १ )
निघ०-उलूखलमुसले॥२९॥हविर्धाने
॥ ३० ॥ द्यावापृथिवी ॥ ३१ ॥ विपाट्
छुतुद्री ॥३२॥ आर्त्ती ॥३३॥ शुनासीरौ
॥३४॥देवीजोष्ट्री॥३५॥देवीऊर्जाहुती॥३६॥
इति षट्त्रिंशत (३६) पदानि ॥३॥
निरु०- अथातोऽष्टौ द्वन्द्वानि-
'उलूखलमुसले' [१] । 'उलूखलं' व्याख्यातम् ।
'मुसलं' मुहुःसरम् ।
तयोः-एषा भवति ॥१(३५)॥
अर्थ:-“अथातो०” यहां से आठ (८) द्वन्द्व पद हैं-
दो दो पद द्वन्द्व समास से एक २ पद के रूप में हैं । उनमें
'उलूखलमुसले' (२९) यह पद है । इसका पहिला 'उलूखल' पद
व्याख्यान किया जाचुका- “उरुकरम्” इत्यादि रूप से
[अ० ९ पा० २ खं० १०]