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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1028

[ प्रधानाङ्गे ] मूर्द्धा में = प्रधान अङ्ग में 'वचसा' (मन्त्रगतेन)
मन्त्र रूप वचन से 'आवेदयामसि' (आवेदयामः) आवेदन कर-
ते हैं श्रद्धा ही धर्म का शिर है- प्रधान अङ्ग है, श्रद्धाके विना
धर्म का लाभ नहीं होता, यह हम मन्त्र वाक्य से ही पुकार
कर कहते हैं- श्रद्धा रहित को धर्म नहीं मिलता।"नाश्रद्द-
धानाय हविर्जुषन्ति देवाः" जो सत्य को धारण नहीं
करता उसके हविः को देवता सेवन नहीं करते। "अश्रद्धा-
मनृते दधाच्छ्रद्धां सत्ये प्रजापतिः" प्रजापति (ब्रह्मा)
ने अश्रद्धा को अनृत [ मिथ्या ] में और श्रद्धा को सत्य में
धारण किया है।
'पृथिवी' (३६) व्याख्यान की जाचुकी " अथ वै
दर्शनेन पृथुः" [ नि०, १ अ०४ पा० ३ खं० ] ।
"तस्या०" उस पृथिवी की यह ऋचा है-॥१०(३१)॥
( खं० ११ )
निरु०-"स्योना पृथिवि भवानृक्षरा निवेशनी
यच्छा नः शर्म सप्रथः ॥” [ ऋ०सं०१,२,६,५य०
वा०सं० ३५, २१]॥
सुखा नः पृथिवि ! भव। अनृक्षरा निवेशनी ।
'ऋक्षरः' कण्टकः। ऋच्छतेः ।
'कण्टकः' कन्तपो वा । क्रन्ततेर्वा । कण्टते-
र्वा स्याद् गतिकर्मणः ।