निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २६१ ) ६ अ० ३ पा० १० खं०
प्रकार है' ऐसी जो बुद्धि उसका अधि देवता का नाम 'श्रद्धा'
है, और वह अग्नि देवता ही है, क्यों कि- सब प्रकाश
अग्नि का ही है ।
उस 'श्रद्धा' की यह ऋचा है ॥६ (३०) ॥
( खं० १० )
निरु०-“श्रद्धयाऽग्निःसमिध्यते श्रद्धया हूयतेहविः।
श्रद्धां भगस्य मूर्द्धनि वचसा वेदयामसि ॥ ”
[ ऋ० सं० ८, ८, ९, १ ]
श्रद्धया अग्निः साधु समिध्यते, श्रद्धया हविः
साधु हूयते, श्रद्धां भगस्य भागधेयस्यमूर्द्धनि
प्रधानाङ्गे वचनेन आवेदयामः ।
'पृथिवी' व्याख्याता ।
तस्य एषा भवति ॥१०(३१) ॥
अर्थः- श्रद्धयाग्निः०”इस ऋचा का श्रद्धा कामायनी
ऋषि है ।
(यः एव) जो ही 'अग्निः' अग्नि 'श्रद्धया' आस्तिक्यबुद्धि
को अवलम्बन करके [कर्मणि] कर्म में 'समिध्यते' दीपन किया
जाता है, वही (साधु) 'समिध्यते' भले प्रकार दीपन किया
जाता है । किन्तु जो अश्रद्धा से अग्नि जलाया जाता है, वह
फल शून्य होने से नहीं जलाया हुआ = व्यर्थ जलाया हुआ
होता है । इसी प्रकार जो 'हविः' 'श्रद्धया' श्रद्धा से 'हूयते'
होम किया जाता है, वही 'साधु' ठीक होम होता है । [वयम्]
हम 'श्रद्धाम्' श्रद्धा को 'भगस्य' (भागधेयस्य) कर्म के 'मूर्द्धनि